मैं माँ से माँ की कहानी सुनना चाहती हूँ। पर माँ अपनी कहानी में बहुत दयनीय हैं।
मैं दयनीय कहानी सुनना तो चाहती हूँ।पर नहीं चाहती कि सुनाने वाला अपने आपको दयनीय समझे। माँ की दयनीयता पर हामी भर देने से वह अपने आपको और दयनीय बना लेती हैं।
बांग्लादेश छोड़ कर भागना, भरी हुई नाव में छोटी बहन की पीठ पर उनकी माँ का शाखा छप जाना। एक बहन को कैम्प की बीमारियों में खो देना।
बाबा का मिलना।
घरवालों के खिलाफ़ जाकर शादी कर लेना।
अपने गरीब पिता के लिए चावल ले जाने पर जेठानी से हाथ काट दिए जाने की धमकी सुनना।
प्रेग्नेंसी के आखिरी दिन धान कूटना।
दादा का छीन लिया जाना।
चंद्रपुर आकर एक कमरे में संसार बसाना।
कलसी में लाइन लगाकर पानी भरना।
रात को बाबा के वापस न आने पर दादा को गोद में लिए पैदल ही उनके फैक्ट्री पहुंच जाना और वहाँ बाबा को 5 रुपये के लिए overtime करते देखना।
इसके बाद की कहानी में मैं हूँ।
मेरी कहानी को मैं दयनीय नहीं कह सकती।
कुछ हिस्से हैं जो नहीं होते तो मेरी कहानी का बचपन, बचपन जैसा सुंदर होता। पर नहीं है।
No comments:
Post a Comment