क्यों चाहता है शेर होना?
जिसे टिकट लेकर, समय देकर,
देखने आए ढेर सारे कीड़ों जैसे आदमी...
जबकि दोनों ही जानवर हैं-
शेर और कीड़े
फर्क़ -
कीड़े हर जगह मिलेंगे
आपके आस-पास, बिना नुकसान पहुंचाये
अपना-अपना काम करते हुए
कुछ बिल्कुल अजनबी होंगे
कुछ आपके काम आ जाएंगे
कुछ को आप पालना चाहेंगे
कुछ को आप कुचल भी देंगे
पर कीड़े ज्यादातर
आपका कुछ बिगाड़ नहीं पाएंगे
शायद इसलिए आदमी कीड़ा नहीं होना चाहता
वो शेर होना चाहता है
जो उसकी पहुंच से बाहर हो
जो अपनी भूख मिटाने के लिए
उसे खा सकता हो
जिसे काबु करना आसान न हो
जिसे पाला नहीं जा सकता
और कुचला तो बिल्कुल भी नहीं
आदमी अपने आस-पास के सभी कीड़ों
को नजरअंदाज कर, अपने कीमती समय से समय निकाल, अपनी मेहनत की गाढी कमाई के पैसों से टिकट निकाल, एक दिन शेर देखने की ख्वाहिश रखता है।
वो खुद भी एक दिन अपने रोज़ दिखनेवाले कीड़े जैसे जीवन से निकल सिर्फ टिकट पर दिखने वाले शेर बन जाने के ख्वाब देखता है।
एक दिन बन भी जाता है
और फिर समझता है कि
दोनों जानवर ही हैं।
कीड़े और शेर
दोनों जी ही रहे हैं
एक रेंग कर, एक दहाड़कर
फर्क़ -
एक टिकट लेकर एक को देख रहा है
और एक बिना टिकट के!
- Manabi Katoch
Metamorphosis
Franz Kafka
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