इस शब्द के बारे में मुझे अभी बस कुछ एक-दो साल पहले ही पता चला।
इसका type1 अचानक किसी भी ट्रिगर के कारण इतना असहनीय दर्द देता है कि आपको सुसाइड करने का मन करता है इसलिए इसे सुसाइड डिजीज भी कहा जाता है।
Thankfully मुझे type2 है जिसमें चेहरे के निचली ओर कहीं भी लगातार दर्द होता रहता है।
करीब 10-15 सालों से मुझे यह दर्द एक मसूड़े में है। इसलिए अब तक मेरे उस दांत का ही इलाज चलता रहा।
जब दांत तक उखाड़ दिया गया और फिर भी दर्द नहीं गया तब जाकर डेंटिस्टों ने अपने हिस्से की जायदाद न्यूरोलॉजिस्टों के नाम की।
तो आजकल उन्हीं को अपनी जमा-पूंजी बांट रही हूँ।
अगर आप भी ऐसे किसी प्राचीन हो चुके दर्द से जूझ रहे हैं और अपनी सम्पत्ति दान कर दर्द से मुक्ति चाहते हैं तो 'पेन स्पेशलिस्ट' नाम के विशेष डाक्टरी जनजाति से संपर्क कर सकते हैं।
खैर ये सब तो मैंने awareness की ख़ातिर बता दिया। मुद्दा यहां दरअसल फलसफे से शुरू हुआ था।
कुछ रोज़ पहले मेरा दर्द अपनी चरम पर था। लगा इसका आखिरी इलाज यानी - दर्द देने वाले उस नस को इंजेक्शन से सुन्न कर देना- यह कर ही लेती हूँ।
पर पेन स्पेशलिस्ट ने सलाह दी कि दवाईयों का डोज बदलकर देख लूँ।
कुछ समय तक तो दवाईयों ने असर नहीं दिखाया पर फिर थोड़ा आराम मिलने लगा।
यूँ तो मेरा दर्द इतने से ही शुरू हुआ था और तब मैं बिना दर्द के रहने के उपाय खोज रही थी।
लेकिन चूंकि दर्द इतना ज्यादा बढ़ गया था कि बर्दाश्त के बाहर था तो अब इस कम हुए दर्द के साथ ही खुश हूँ।
जिंदगी में शायद ऐसा ही होता है। बचपन में हम छोटे मोटे दर्द की शिकायतें कर रहे होते हैं। लेकिन बड़े होते होते इतना कुछ सह चुके होते हैं कि बचपन जितने दर्द की दुआ मांगने लगते हैं।
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