पन्ना दी सुबह दनदनाते हुए आयीं। स्कूल में ptm था। वह अकेली ही जाती हैं। पति साथ नहीं रहते। जिल्लत से भी बच जाते हैं। पर इस बात को कोई फेमिनिस्ट कह दे तो वह लड़ पड़ती हैं कि पति को भी तो ऑफिस में अपने हिस्से की जिल्लत सहनी पड़ती है।
एक बार सास की उलाहना की बात पर उन्होंने यह बात कही थी।
उनके अनुसार पत्नी को घर और पति को बाहर की जिम्मेदारियां इसलिए दी गई हैं क्योंकि बच्चे तो औरत ही पैदा कर सकती है और तब उन नौ महीनों में वह कैसे कमाएगी?
चलिए 3 साल ही ले लीजिए। पूरे जीवनभर में से 3 साल न कमा पाने की सज़ा औरत को सारी उम्र काटनी पड़ती है। नहीं मैं नहीं कहती कि गृहिणी होने में कोई बुराई है। पर अगर मर्दों से कहा जाये कि क्योंकि तुम ताकतवर होते हो तो मजदूरी करने या कुश्ती लड़कर ही तुम्हें घर चलाना होगा तो?
पन्ना दी को यही सही लगता है क्योंकि इससे उनके किए फैसले सही नजर आते हैं। वह Engineer थीं। पति से ज्यादा काबिल। पर पति एक जगह टिककर नौकरी नहीं कर पाते थे। सो, उन्होंने एक जगह रहकर बच्चों की परवरिश करने को जीवन बना लिया। ट्यूशन लेती हैं। पर अपनी क्षमता से बहुत कम जीने का अफसोस उनके चेहरे पर साफ़ झलकता है।
मीनू दी की बात अलग है। नौकरी उन्होंने भी छोड़ी थी। पर शायद उन्हें लगता है कि उन्होंने अपनी क्षमता जितनी नौकरी कर ली थी। उनके नौकरी छोड़ने में त्याग, बलिदान जैसे शब्द शामिल नहीं हैं।
दुःखी रहती हैं पर कई कारणों से। कभी बेटी की पढ़ाई को लेकर, कभी बेटे की बेरोजगारी की वजह से, तो कभी पति के रह रहकर बीमार पड़ते रहने को लेकर। पर सब स्वीकार करती हैं। उनकी अंदर बाहर की दुनिया में कोई अन्तर नहीं है।
जो अच्छा नहीं लगता उनके मुंह पर नहीं कह पाती, पर ज्यादा देर तक पेट में भी नहीं रख पाती। किसी न किसी बहाने से मेरे घर पहुंच जाती हैं और निंदा कर ही देती हैं। पन्ना दी की बात हो तो मैं भी पीछे नहीं हटती। उनका दोगलापन मुझसे कई बार बर्दाश्त ही नहीं होता।
पीहू भाभी का अच्छा है। पति बेहद प्यार करते हैं, बेटा बढ़िया कमाता है और बिटिया बुढ़ापे की औलाद है तो उसका बचपन उन्हें किसी दादी नानी सा ही प्यारा है। न किसी के फटे में टांग अड़ाती हैं, न किसी की किसी बात पर कोई मत होता है उनका। उन्हें बस समय बिताने के लिए कोई चाहिए होता है, तो सबसे बनाकर रखती है।
हम अक्सर सर्दियों में सुबह की धूप सेकने और गर्मियों में साथ बैठकर गपशप मारने अपनी सोसाइटी के पार्क में मिलते हैं।
हाल ही में बिमला दीदी भी इसी ग्रुप में शामिल हुईं। वह रिटायर्ड हैं। एक ही बेटी है और बहुत पैसा है। जब मन करे, जहां मन करे घूमती हैं। पति भी घूमने के शौकीन हैं तो शायद कोई मसला नहीं होता। मुझे लगता है मैं उनकी तरह कभी घूम नहीं पाऊँगी।
कभी-कभी लगता है काश घूम पाती। कभी-कभी लगता है काश माँ भी घूम पाती। जवानी में नौकरी कर पाती और बुढ़ापे में बिमला दी की तरह घूम पातीं। मैं नौकरी तो कर पाई। पर घूम नहीं पाई। अभी समय है। क्या पता घूम लूँ। जैसे जब मैंने नौकरी करनी शुरू ही की थी, तब प्रिया के पास कुक थी। मुझे लगता था क्या कभी मैं इतनी अमीर हो पाऊँगी कि मेरे घर भी कुक होगी? प्रिया कहती थी उनके पास भी नहीं था कुक, अब है। मेरे पास भी प्रिया की उम्र की हो जाने पर अब कुक है। ऐसे ही बिमला दी की उम्र की हो जाने पर क्या पता मैं भी घूम पाऊँ। पर मेरा पति बिमला दी के पति की तरह घूमने का शौकीन नहीं है। पर वो तो वह कुक के हक़ में भी नहीं था कभी। पैसे ने बहुत कुछ बदल दिया। माँ के पास न समय है, न पैसा, जो कुछ बदल दे।
वो कहती हैं कि वह इसी बात से संतुष्ट है कि उनके बच्चे ऐश कर रहे हैं। पर पता नहीं क्यों, वह जब ये कहती हैं तो संतुष्ट कम, दुःखी ज्यादा लगती हैं। जब संसार से निवांत होकर अपने लिए समय निकालने की बारी आयी तो पिताजी को लकवा मार गया।
मैं उनके कहने पर चिढ़ती हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि वह लगातार अपनी महानता साबित करने पर तुली होती हैं। पर पिछले कुछ समय से उस दृश्य को सोचकर मेरा भी हृदय कांप उठता है जब बाढ़ आने पर घर में पानी घुस गया था। बिस्तर पर पड़े बाबा, सुनसान रात और अकेली माँ, कैसे संभाला होगा उन्होंने सब? कितना डरी होंगी। रोना आया होगा। रोई भी होंगी।
प्रिंसेस के माता-पिता का जीवन इतना कठिन नहीं होगा न?
प्रिंसेस मेरे बचपन की साथ खेलने वाली। सहेली इसलिए नहीं कह सकती क्योंकि सहेलियों जैसा उन्होंने कभी बर्ताव नहीं किया।
मेरे पिता बाबु थे और उसके अफसर। उस कॉलोनी में हमारी उम्र का और कोई बच्चा नहीं था तो प्रिंसेस मेरे साथ खेल लेती - मजबूरी और एहसान का मिलाजुला अहम लिए।
वह अब US में रहती है। उसके माता-पिता वहाँ जाते रहते हैं। संसार से निवांत होने पर उन्हें कोई बीमारी नहीं हुई। उनके पास पैसा भी भरपूर था।
पीहू भाभी आज सुबह पार्क में नहीं आयीं। उनके माता-पिता आनेवाले थे। एक महीना रहेंगे।
माँ का शाम को फोन आया था। हम फोन पर बात कर लेते हैं। बाबा बात नहीं करते।
पन्ना दीदी के माता-पिता दोनों की ही मृत्यु हो चुकी है। अपने कई गुणों का व्याख्यान करते हुए कई बार वह अपने माता-पिता की महानता का भी बखान करती हैं।
उनकी माँ नौकरी करती थीं। मेरी माँ नौवीं पास थीं। त्याग की अपनी-अपनी परिभाषाएं होती हैं हर माँ के लिए।
मैं कुछ त्यागना नहीं चाहती। पर लगता है अपने आप ही छूट जाता है कितना कुछ।
एक दिन हम सब मर जाएंगे। जिनके साथ हम जी रहे हैं। मैं उन सबसे पहले मरना चाहती हूँ, जिनके साथ मैं जी रही हूँ। ताकि मुझे किसी की मृत्यु का दर्द न झेलना पड़े। मृत्यु का दर्द सबसे बड़ा दर्द होता होगा न?
जिनके साथ आप हँस खेल रहे हैं, उनका फिर कभी न मिलने की पुष्टि, कितनी बड़ी त्रासदी है!
क्या दुनिया ऐसे ही चलती रहेगी। जन्म, खुशी, मृत्यु, वियोग, असहनीय पीड़ा?
क्या कभी ये सबकुछ खत्म नहीं होगा?
हर चीज का अंत होता है तो क्या इस खेल का न होगा कभी?
अगर होगा तो काश अभी हो जाए।
जीते रहना कितना थकाने वाला काम है। हमेशा किसी न किसी की तैयारी करते रहना होता है। कभी थककर शांत सो नहीं सकते जब तक मन करे तब तक।
दसवीं के पेपर है- दिन रात पढ़ते रहो।
बच्चा छोटा है- दिन रात उसे पालते रहो।
नौकरी है- जीवन भर करते रहो।
भूख लगती है- हमेशा खाने का इंतजाम करते रहो।
और करते करते करते मर जाओ। अपने मन से कभी जियो ही नहीं।
कोई अपना पहले चला जाए तो अपने जाने की प्रतीक्षा में मृत्यु से बदतर जीवन जीते रहो।
क्यों नहीं एक साथ दुनिया खत्म हो जाती। और धरती खाली हो जाती। एक सुनसान पड़े घर की तरह?
या भगवान वह धनी सेठ है जिसने बस अपने बंगले को खंडहर बनने से रोकने के लिए बिना वजह उसकी सफ़ाई के लिए नौकर रख रखे हैं। कब तक रहेगा बंगला? हमेशा तो नहीं रह सकता न? तो नौकरों के साथ इतनी सख्ती क्यों? कि बंगले का कोना कोना साफ़ होना चाहिए। बगीचे में हमेशा फूल खिले होने चाहिए। क्या इसलिए कि कभी मालिक का मन ही कर जाए यहां आने का तो सब साफ सुथरा मिले और वह यहां अय्याशी करके, इसे गंदा करके जा सके?
काश मालिक को यह समझ आ जाए कि एक न एक दिन बंगले को या गिरना है या खंडहर बनना है और वह नौकरों को छुटकारा दे दे।
मैं तुम्हारे लिए ऐसा कोई त्याग नहीं करना चाहती जिसके लिए मैं तुम्हें पूरा जीवन दोषी ठहराती रहूं।
मैं 10 सालों से एक पत्रिका चला रही हूँ। पत्रिका तो मशहूर है पर मेरी ख़ास पहचान नहीं है।
आज देखा Lallantop के सौरभ द्विवेदी ने 10 सालों बाद अवकाश ले लिया। मानों हाहाकार ही मच गया। हमने साथ सफ़र शुरू किया था। पर रास्ते बहुत अलग थे। उनके भी बच्चे तब छोटे रहे होंगे। पर वह फील्ड पर जा सकते थे। कैमरे पर आ सकते थे। वह पुरुष थे। उनकी पत्नी घर पर रही होंगी। दस सालों में उनकी पत्नी की भी 'उनकी पत्नी' होने के अलावा और कोई पहचान नहीं बनी होगी। हिन्दी उनकी भी भाषा थी, मेरी भी। पर उनकी दुनिया में हिन्दी प्राथमिकता थी। मेरी दुनिया में उसका अस्तित्व, अंग्रेज़ी की सहायता करने भर की थी।
उसके लिए पोस्ट पर पोस्ट आ रहे हैं। हज़ारों कमेंट्स।
मेरे चले जाने पर ऐसा कुछ नहीं होगा।
मृत्यु के बाद क्या होता है कोई देख नहीं सकता। पर जीते जी कहीं चले जाने पर लोगों का अपार प्रेम उमड़ता देखना कितना सुखद, कितना गौरवशाली होता होगा।
अफसोस हम जैसों को यह गौरव भी प्राप्त नहीं।
मैं बचपन में जिस घर में रहती थी वह अंदर से बहुत छोटा था और बाहर से बड़ा। बाहर आँगन, बगीचा, खेत
सब था, पर अंदर केवल 2 कमरे।
अब मैं जिस घर में रहती हूँ वह अंदर से बहुत बड़ा है पर बाहर से छोटा। अंदर बड़े-बड़े 5 कमरे। पर बाहर एक क्यारी भर की जगह बस!
और अब मैं एक ऐसा घर तलाशती रहती हूँ जो अंदर बाहर दोनों ही से बड़ा हो। अंदर 5 बड़े-बड़े कमरे और बाहर आँगन, खेत, बगीचा... सब!
कितनी अजीब बात है न जिस बचपन को मैं जल्दी से पीछे छोड़ देना चाहती थी, आज उसी को ढूंढती हूँ।
मेरा वर्तमान मीना से बहुत अच्छा है ऐसा मुझे लगता है। वो अब हमारी सुबह की गपशप मंडली में नहीं आती। कभी रोज़ आया करती थी। जिस सास ने उसे अधेड़ होने तक प्रताड़ना दी वो मर गयी। पर जाते जाते भी उसके बाकी उम्र का इंतजाम कर गई। उसके ससुर अब उनके साथ रहने लगे हैं। बंध गई है चूल्हे चौके में। मन की कर लेती है पर ज्यादातर मन मारे रहती है। "अब ऐसा ही रहेगा" उसने इस बात को स्वीकार लिया है।
पिछले दिनों उमर खालिद को भी बेल नहीं मिली। उसने देश के खिलाफ़ कुछ कह दिया था। उसकी बीवी ने बताया कि उसने भी जेल से यही कहा था कि "अब ऐसा ही रहेगा।"
कुछ लोग समझते हैं कि उसके साथ ऐसा ही होना चाहिए और कुछ सहानुभूति रखते हैं कि ऐसा भी क्या जुर्म कर दिया? पर कम-से-कम लोग उसके "अब ऐसा ही रहेगा।" की चरम नाउम्मीदी वाले दुःख को जानते तो हैं। मीना और उन जैसी करोड़ों औरतों के "अब ऐसा ही रहेगा।" की विवशता को जानते हुए भी लोग इसे दुःख मानने से इंकार करते हैं।
मैं अपनी बेटी को आज जलन की अनुभूति को स्वीकारने की सीख दे रही थी।
और अभी शाम को जब मुझे एक बार फिर सौरभ द्विवेदी की लोकप्रियता से जलन हुई तो सहसा अपनी दी हुई सीख याद आ गयी कि- अपने से किसी विषय से बेहतर व्यक्ति से जलना स्वाभाविक है। उस जलन से लज्जित न हों। उसे स्वीकारो। उसका वह गुण सीख सकते हो तो ज़रूर सीखो। न सीख सकते हो तो स्वीकार लो कि वह तुमसे इस विषय में बेहतर ही रहेगा। पर इस सारे फेर में अपने आपको जरा भी कम मत आंकों। तुम जिस विषय में अच्छे हो उसे इतना अच्छा कर लो कि तुम उसमें सबसे अच्छे बन जाओ!
पर क्या संघर्ष अच्छा बने रहने देता है?
मेरा एक दोस्त था, शेखर। बचपन से बहुत ज्यादा बुद्धिमान। माता-पिता के पास पैसे नहीं थे तो सस्ते हिन्दी मीडियम स्कूल में पढ़ा। सस्ती कमीज़ पहनी। सस्ती चीजें खाईं। हमेशा अव्वल आया, फिर भी अपने पिता के मालिकों की नजरों में हमेशा अपने लिए हीन भावना ही देखी। उन्होंने कभी कुछ दिया भी तो प्यार से नहीं, दया से। बराबरी के लिए शेखर शायद पूरा बचपन तरसता रहा।
पर ढेर सारा संघर्ष कर आखिर मेरिट के दम पर इंजीनियरिंग कर ही ली, फिर एमटेक और फिर पीएचडी भी। बड़े कॉलेज में पढ़ाने लगा।
सब उसकी तारीफें करते। माँ-बाप तो मानों ऐसा पुत्र पाकर धन्य हो गए थे। दिन में सौ सौ बार ईश्वर को उसके लिए धन्यवाद देते नहीं थकते।
जिस दिन शेखर का शहर के सबसे बड़े कॉलेज में दाखिला हुआ था, उसके पिता उस दिन मालिकों के पास मिठाई लेकर पहुंचे थे। पर तब भी मालिकों की मुबारकबाद में सम्मान की नहीं आश्चर्य की बू आती थी।
पर जिस दिन शेखर ने IIT में पढ़ाना शुरू किया, उस दिन मालिकों का मानों घमंड का घड़ा सा टूट गया। उसके पिता को "अच्छा है अच्छा है, ठीक निकल गया तेरा बेटा" कहने की बजाय, वो शेखर को सीधे अंग्रेज़ी में बधाई देने लगे। संघर्ष से तपकर यहां तक पहुंचे शेखर को शायद बराबरी मिल जाने पर संतोष और कृतज्ञ होना चाहिए था, पर हुआ इसके ठीक विपरीत।
शेखर को एक अहंकारी आनंद का अनुभव हुआ उस दिन!
कुछ समय बाद मालिक के बेटे का एडमिशन भी शेखर के कॉलेज में हो गया। दरअसल शेखर ने ही जी जान लगाकर उसकी तैयारी करवायी थी। इसलिए नहीं कि वह मालिकों का कोई एहसान मानता था। बल्कि इसलिए क्योंकि वह चाहता था कि मालिक उसकी वैसे ही खुशामद करे जैसे कभी उसके पिता मालिक की करते थे। और वह वैसे ही इतराता रहे जैसे कभी मालिक इतराते थे।
एक दिन मालिक का बेटा अपनी गाड़ी से कॉलेज आ रहा था और शेखर अपनी स्कूटर पर सवार कॉलेज से बाहर निकल रहा था। मालिक के बेटे को देख उसके लगभग सामने रुककर उसने हाथ दिखाया। ऐसे अचानक सामने आ जाने से मालिक के बेटे ने तेजी से ब्रेक तो दबाया पर फिर भी शेखर की स्कूटर को धक्का लगा गया। शेखर धम से गिर पड़ा और स्कूटर के आगे का हिस्सा बुरी तरह टेढ़ा हो गया। मालिक का बेटा तुरंत गाड़ी से निकल आया। गार्ड, बाकी कर्मचारी और छात्र भी दौड़कर आए। शेखर को यूँ तो कुछ न हुआ था पर बड़ा बन जाने के बाद ये पहली बार था कि उसको फिर वही बचपन वाले तिरस्कार की अनुभूति हो रही थी।
उसने तुरंत उठते ही मालिक के बेटे का कॉलर पकड़ लिया और उसे गालियां देने लगा। उसने धमकी दी कि अब वह इस एक्सीडेंट की रपट लिखवायेगा। लड़का डर गया। उसने तुरंत अपने पिता को इसकी सूचना दी और शेखर से बात करने को कहा।
मालिक अपने बेटे को समझाता रहा कि अरे ये तो अपना शेखर है, ये क्यों ऐसा करेगा, पर बेटे ने शेखर की गुस्से से लाल हुई आंखों में उस धमकी की सच्चाइ देख ली थी।
मालिक ने शेखर के पिता को बुलवाया और उन्हें अपने बेटे को समझाने को कहा। पिता पूरी उम्र नौकर रहे थे। बेटा कितना भी बड़ा क्यों न हो गया हो, पिता अब भी नौकर थे। उन्होंने तुरंत कहा "जी हुजूर उसकी ये मजाल कि बाबा को कुछ कहे। मैं अभी उसकी खबर लेता हूं।"
मालिक निश्चिंत हो गया।
पर शाम को शेखर के पिता का फोन आया- "हुज़ूर, बेटा बड़ा हो गया है। अब बाप की कहाँ सुनता है। अम्म.. बुरा न माने तो आप???..."
"ठीक है, ठीक है" मालिक ने झल्लाते हुए कहा, "मैं देख लूँगा!"
गुस्से में लाल हुए मालिक ने शेखर को फोन लगाया। पर फोन की दो घंटियां बजते बजते उन्हें समझ आया कि अभी गरज़ उनकी है तो ठंडे दिमाग से ही काम लेना होगा। शेखर के फोन उठाते ही उनका स्वर बदल गया। उन्होंने प्यार से समझाया, फिर माफ़ी मांगी, फिर गिड़गिड़ाये भी कि उनके बेटे का भविष्य खराब न करे। पर शेखर उनकी सुनने को तैयार ही नहीं था। अखिर आधे घंटे की बहस के बाद शेखर इस बात पर राजी हुआ कि दोनों परिवारों के सामने उससे माफ़ी मांगी जाए।
ऐसा ही हुआ।
शेखर के माता-पिता देखने में खुश नहीं लगते थे पर कहीं न कहीं उनके चोट लगे अहम को थोड़ी राहत तो मिली ही थी, इससे वह इंकार नहीं कर सकते थे।
यह सुनिश्चित करने की बजाय कि समाज में जो भी जहां भी खाना बनाने का काम चुनकर खाना बना रहा है, वह पूरी ईमानदारी से, सफ़ाई से और समाज के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी लेता हुआ खाना बनाए, हमने औरतों पर ही इस बात का दारोमदार दे दिया।
बाहर का खाना स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होता इसलिए घर की औरत को ही खाना बनाना चाहिए।
Sometimes it's hard. You are at your daughter's ptm. Asked to keep the phone on silent. Your cook, maid, a delivery boy, garbage collector... all come at your doorstep when you are away. You call them as soon as you are free but they are gone. They scold you for not picking up call. You have to now figure out what to feed your daughter, when to clean the dishes, raise a complaint for your order not being delivered and carry the garbage till the drop point.
जिस तरह Psychology of Money पढ़कर लोगों को समझ आया कि अमीर लगना नहीं, अमीर होना महत्त्वपूर्ण है, सोचती हूँ इस बात को समझाने के लिए भी एक किताब लिख दूँ कि ज्ञानी लगना नहीं, ज्ञानी होना महत्त्वपूर्ण है।
Note - असली धनी और असली ज्ञानियों को यह बात कोई किताब पढ़े बगैर ही पता है। तभी न आप उनको बहुत चकमक गाड़ी, घर, फोन या कपड़ों में देखेंगे, न ही कठिन शब्द बोलकर अपने ज्ञान का बखान करते हुए!
Damaged people are dangerous. Because they know how to survive!
आज सुबह मनीषा आयी। पहले हमारे ही कॉलोनी में रहती थी। मेरे आने से पहले। एकदम दूध की तरह गोरी। अमीरों की तरह स्टाइलिश कपड़े। बिल्कुल चमकदार नेल पोलिश लगायी हुई। साथ में पति और दो बच्चे। एक जो शायद 3-4 साल की रही होगी यहां रहते हुए, अब 12 की है। और एक 4-5 साल का बेटा। पति भी काफी मिलनसार लगा। पन्ना दी ही उसे जानती थी। बाकियों ने बस नाम सुना था। मैंने नाम भी नहीं।
थोड़ी ही देर में पता चला कि पहले नौकरी करती थी। फिर Covid हो गया। फिर दूसरा बच्चा। पन्ना दी उसे सांत्वना गलत शब्द होगा... कुछ गर्व जैसा महसूस कराने लगी कि अब यही तुम्हारा फुल टाइम जॉब है।
हम जो गलतियां करते हैं, उन्हें दूसरों को सिर्फ इसलिए क्यों दोहराने के लिए कहते हैं ताकि उन्हें बस हम अच्छे लगे?
None of us really know what's going to happen. May be we all just need to learn to love the questions.
I can see how irrelevant i've become to you and I shall take considerable strength from that!
I don't think we can ever separate who we are from what we've done.
कभी-कभी आप बहुत भूखे होते हो। पर समय पर खाना न मिलने पर भूख मर जाती है। इच्छाओं का भी कुछ ऐसा ही है - समय पर पूरी नहीं होती तो मर जाती हैं!
भूख सहते सहते आदत तो हो जाती है। पेट अब नहीं बोलता। पर अचानक किसी दिन पूरा का पूरा शरीर जवाब दे जाता है। इच्छाओं को मारते मारते एक दिन मन जवाब दे जाता है!
Children from broken homes -
टूटे हुए घरों के बच्चे!
इनसे सभी को सहानुभूति होती है. सब को लगता है कि इन्होंने बहुत कुछ सहा होगा. पर दरारों से भरे हुए घर के बच्चों के बारे में कोई नहीं जानता. घर टूटने के बाद फिर से बनता तो है- दो अलग अलग ही सही!
पर दरारों से भरे हुए घर में हमेशा मिट्टी गिरती रहती है. कभी पानी रिसता है, तो कभी सीलन पड़ जाती है. इन बच्चों को इसी के बीच रहकर बड़े होना पड़ता है. बाहर से घर बिल्कुल परफेक्ट लगता है. किसी को पता नहीं चलता कि ये घर, टूटे हुए घर से कहीं ज्यादा खतरनाक है!
"That's the funny thing about hope. Nobody else gets to decide if you feel it. That choice belongs to you."
उस दिन जब तुषार स्कूल से वापस आया तो उसकी माँ मर चुकी थी। कोई सुसाइड नोट नहीं मिला. Depression में थी. हमेशा सिर में दर्द रहता था. छुटकी की शादी में बहुत तमाशा भी किया था. इलाज चल रहा था. हर तरह का. पर आखिर बर्दाश्त नहीं हुआ शायद.
तुषार छोटा था.
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