Tuesday, May 5, 2026

माँ भगवान

​माँ होना आसान नहीं होता। अक्सर आपसे कहा जाएगा कि ये बस शुरू के कुछ साल कठिन होता है, क्यूंकि बच्चा न बोल पाता है, न समझ पाता है। पर ये सिलसिला कुछ वर्षों का नहीं पूरे जीवन का है। माँ को भगवान का दर्जा दिया जाना गौरवशाली तो लगता है, पर एचके सचमुच उससे भगवान जैसा बर्ताव चाहते हैं - कि उसे न कभी बुरा लगे, न दर्द हो, वो लगातार निरंतर मुस्कुराती हुई काम करती रहे और सबके मन की बात बिना कहे समझ ले। बच्चे उम्र भर आशा रखते हैं कि माँ उनके बिना कहे सब समझ ले और वो माँ को कभी न समझे। 

हम भूल ही जाते है माँ के पीछे छुपी उस लड़की को, जो दुलार चाहती है, चाहती है कोई उसके मन की समझकर उसके लिए भी किसी दिन उसके मन का पकवान बना दे। चाहती है कि मन न हो तो कुछ भी न करे, बस सारा दिन बिस्तर पर पड़े पड़े टीवी देख ले।

माँ भगवान नहीं होती। और अगर होती भी है तो क्यों नहीं सजाए रखते उसे मंदिर में? 

Thursday, April 30, 2026

नक़ली

​नक़ली नोट 

नक़ली दवाईयां 

नक़ली घी 

नक़ली बटर 

और अब नक़ली इंसान बना दिए असली इंसानों ने 

बिल्कुल वैसी हँसी 

वैसा ग़ुस्सा 

वैसी ही भावनायें 

इतना सटीक कि पहचानना मुश्किल 

नक़ली की इस भीड़ में कितना मुश्किल हो जाएगा असली रह जाना 

नक़ली काया बन जाने से बहुत पहले का चलन है यह 

कि नक़ली लोग बेहतर नज़र आते हैं असली से 

नक़ली की भीड़ में असली गुम हो जाता है 

धूमिल हो जाती है उसकी पहचान 

क्योंकि कड़क नहीं रह पाता असली नोट नकली की भाँति 

सशक्त नहीं रह पाता असली इंसान नकली की तरह 

वह कभी थकता है, टूटता है, बिखर भी जाता है 

पर इंसान को पसंद है विचलित न होने वाले लोग 

लगातार बिना थके काम करने वाले मजदूर 

बिना सवाल किए हाँ में हाँ मिलाने वाले कर्मचारी 

और बिना नागा किए धूप बारिश बरसात में काम पर समय पर आ जाने वाले नौकर 

इसलिए नक़ली कामयाब है 

इसलिए नक़ली नोट, बटर, घी हो या लोग 

ज़्यादा चलते हैं वे 

ज़्यादा मुनाफा दिलाते हैं 

और असली से ज़्यादा जल्दी अपना साम्राज्य फैलाते है 

जीत जाते हैं अक्सर नक़ली 

नक़ली बनाते बनाते ये अक्सर भूल जाते हैं असली इंसान! 

Friday, April 24, 2026

मीता

“बस यह अध्याय यही समाप्त होता है वीरेन!”

“इतनी सी थी हमारी कहानी!”

मीता ने ढेर सारे स्नेह और अपार पीड़ा भरी निगाह से वीरेन की ओर देखते हुए कहा!

बचपन! कितना बचपन याद नहीं! पर जब से होश था तब से मीता ने वीरेन को चाहा था। चाहत सिर्फ़ वीरेन की नहीं थी। उसके माता पिता को भी वह उतना ही चाहती थी।

वीरेन के पिता उसके पिता के परम मित्र थे। और उसकी माँ, मीता की माँ की पक्की सहेली। आना जाना, मिलना जुलना, पार्टी, दुर्गा पूजा पर साथ पंडाल में बैठे रहना। मीता ने ये सारे अच्छे पल इस परिवार के साथ ही अनुभव किए थे।

बाकी समय उसके जीवन में अच्छे पल कम ही होते। घर पर माँ बाबा अक्सर झगड़ते रहते।

वीरेन को भी उसने अपने माता-पिता से थोड़ा कटा-कटा ही देखा था। दोनों एक स्कूल में पढ़ते थे और दोनों ही पढ़ाई में फिसड्डी थे। 

फ़िल्मों में अक्सर उसने देखा था कि एक जैसे पृष्ठभूमि वाले दो बच्चे अक्सर एक दूसरे से प्यार करने लगते हैं। और दो दोस्त अक्सर अपने बच्चों की शादी कराकर दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल देने की कसमें खाते है। इन सब संकेतों से उसे पूरा यकीन था कि उसकी शादी वीरेन से ही होगी।

उसे बस इंतज़ार था सही वक्त का। उसने कभी वीरेन   से कुछ कहा नहीं। उसे लगता था, आठवी-नौवीं बहुत जल्दी है।

पर फिर…. वीरेन नौवीं में था, वो आठवीं में। उसके किसी दोस्त ने उसे बताया कि वीरेन को कोई पसंद है। वो बहुत सुंदर थी। इस बात का तो हिसाब-किताब मीता ने लगाया ही नहीं था कि अक्सर फ़िल्मों में नायक जिससे भी प्रेम करता है वो सबसे सुंदर होती है।

नायिका होने की पहली शर्त, नायक की पृष्ठभूमि से मेल खाना, या उसके परिवार के करीब होना नहीं, बल्कि सबसे सुंदर होना होता है।

कुछ ही दिनों में किसी तरह वीरेन की माँ को पता चला कि मीता वीरेन को पसंद करती है। उन्होंने मीता की माँ को यह बात बतायी। मीता ने हामी भरी तो घर में कोलाहल सा मच गया। वीरेन ने मीता से बात करना बंद कर दिया।

आज 35 साल बीत गए उस बात को।

वीरेन की माँ की आज तेरहवीं है। मीता बिन बुलाये ही चली आई।

सोचने लगी काश वीरेन के लिए जो स्नेह था उसे किसी नाम में बाँधने के सपने न देखती, तो आज भी वीरेन उसका सबसे अच्छा दोस्त होता। जैसा वीरेन के पिता उसके पिता के थे, या वीरेन की माँ उसकी माँ की।

घर पहुँची तो वीरेन से ध्यान बिल्कुल हट गया। मीता की नज़रें वीरेन की माँ की फोटो पर टिक गई। सबकुछ उस घर में वैसा का वैसा ही था। बस, एक व्यक्ति फोटो में बदल गया था। उसके आस-पास जो चीज़ें उससे चला करती थी, वो वैसी की वैसी चल रही थी। पर अब वो उन्हें नहीं चला रहा था। वो शांति से फोटो हुआ बैठा था। 

बचपन की अनगिनत यादें उसके आगे फ़िल्म की रील की तरह चलने लगीं। 

अगली बार आए तो शायद वीरेन के पिता भी न मिले। और वीरेन से भी शायद फिर कभी…. कभी भी मिलना न हो!


“बस यह अध्याय यही समाप्त होता है वीरेन!”

“इतनी सी थी हमारी कहानी!”

और… चूँकि पुनर्जन्म झूठ है…. हम अनंतकाल के लिए बिछड़ गए!!!!!


याद है कुछ भी हमारी? कन्हैया?

कई दिन बीत गए। मीता वापस घर चली आई। पर कुछ छूटा छूटा सा महसूस होने लगा। जैसे कुछ अधूरा रह गया हो। कई दिनों तक वो सोचती रही कि क्या वह वीरेन से इतना भी नहीं जता सकती कि वह उसकी परवाह करती है। वीरेन की माँ के गुज़र जाने पर जो ख़ालीपन उसे महसूस हो रहा था, वीरेन को तो इससे कई कई गुना ज़्यादा महसूस हो रहा होगा। तो क्या वो एक दूसरे से अपने इस साझा खालीपन को बाँटकर थोड़ा हल्का नहीं महसूस कर सकते?

पहले सोचती रही कि अगर चाहे भी तो नंबर किससे मांगे? सोचते सोचते उसने ऐसे ही व्हाट्सएप पर वीरेन का नाम टाइप किया। और ये क्या? वीरेन का नंबर उसके पास सेव्ड था। 

क्या लिखूँ? लिखूँ या न लिखूँ? करते करते कुछ दिन और बीते। कभी लगता ऐसे किसी रिश्ते का क्या फ़ायदा जिसके बारे में किसी से वह खुलकर बात भी न कर सके। माँ को बताती कि वह वीरेन का हालचाल पूछती रहती है तो पता नहीं वह क्या सोच लेती। 

फिर पता नहीं कैसे एक दिन लगा कि देखी जाएगी। मन में जो है वो कोई पाप तो नहीं। बस एक साफ़ सुथरा एहसास है अपने बचपन के साथी के प्रति। सालों बाद जब मेरी मृत्यु होगी तो क्या पता वीरेन आए पर तब… 

न जाने वीरेन की माँ को किस किस से क्या कहना था, जो वो बिना कहे ही चली गईं। कहकर जाती तो अच्छा होता न?

मीता ने फ़ोन उठाया और टाइप करना शुरू किया…


Hi Viren

Hope you are doing well. Couldn’t get a chance to speak to you for a long time but please know that you have (an almost cousin-like) friend who is always there if you ever need any help in life.


No one can replace aunty’s warmth in our lives, but being there for each other might help us feel a little bit of her around us.


Please take good care of yourself and uncle.

I really hope to see you all whenever I visit home. Home never felt like home until I met aunty and uncle all these years. You all have been such an integral and beautiful part of my childhood that I don’t even have a memory of it without you or Babu (Viren ka chota bhai).


Please keep in touch.

- Meeta


लिखकर मन हल्का सा हो गया। पर कई घंटों बाद भी व्हाट्सएप पर डबल टिक नहीं आई। शायद वीरेन का यह नंबर बंद हो चुका है!









Tuesday, April 21, 2026

मृत्यु पर शोक

​माँ को लगता है जो रोता है शोक सिर्फ़ उसी को होता है।

तृप्ति नहीं रोई। उसे ज़रा भी दुख नहीं था। पर शुभो की बहू अच्छी है। फूट फूटकर रो रही थी।

क्या हर व्यक्ति के मर जाने पर, उससे जुड़े हर व्यक्ति को दुख होना चाहिए? क्या बाबू के मर जाने पर माँ को दुख हुआ था?

उनकी मृत्यु के कई साल बाद भी माँ जब भी उनका नाम लेती हैं, घृणा से लेती हैं। उनके बच्चों, यहाँ तक की उनके पोते पोतियों के साथ कुछ बुरा होने पर माँ के अफ़सोस में मुझे एक गुप्त संतोष दिखायी पड़ता है।

आपके साथ कोई बुरा करे तो क्या आप उस सारे बुरे को मृत्यु के साथ ही भूल जाते हैं?

क्या आप रो पाते हैं उसकी मृत्यु पर?

ज़रूरी तो नहीं कि जिस व्यक्ति से आपकी अच्छी यादें जुड़ी हैं, उससे हर किसी की अच्छी यादें ही जुड़ी हों। 


Monday, April 20, 2026

माँ का फ़क्र

​माँ दादा पर फ़क्र करती रहीं।

मैं कोशिश करती रही।

फिर एक दिन, हार मान ली!


Sunday, April 19, 2026

Kakima

​19 April 2026

शाम के करीब 4:30 बजे माँ का फ़ोन आया!

बस आधा घंटा पहले…

आज वो चली गईं। 

उनके साथ चले गए उनके सारे दुख, दर्द, पुण्य … और शायद तथाकथित पाप भी।

हम गरीब थे। उनके comparison में तो थे ही।

मैंने हमेशा अमीरी-गरीबी और क्लास के फ़ासले को याद करते हुए गुड़िया की मम्मी को ही याद रखा। अब सोचती हूँ, काकी माँ को क्यों नहीं याद रखा?

माँ नौवीं पास थीं, काकी माँ ग्रेजुएट, सरकारी नौकरी करने वाली! पर बहुत ज़ोर देने पर भी शायद हम में से कोई भी या माँ भी ये याद नहीं कर पाएंगी कि गलती से भी कभी काकी माँ ने उन्हें इस बात का एहसास दिलाया हो।

माँ को वो हर बात बताती थी। सोनू उन्हें BBC बुलाता था। 

साथ पार्लर जाना, साड़ियाँ ख़रीदने जाना। वो अपनी क्लास की किसी के साथ भी ये सब कर सकती थी ना?

हर बार कर्ज लेना पड़ता था उनसे। ऑफिस आते हुए ख़ुद पैसे लेकर आतीं। काकू फ्री में हमारा इलाज करते थे। सैंपल दवाइयां भी ले आतीं कई बार। 

पंचमढ़ी नहीं भी ले जाती हमें तो क्या था। पर जानती थीं कि शायद ही कहीं घूमने का मौक़ा मिलेगा हमें। पीछे मुड़कर देखूँ तो इस तरह ३ बच्चों की ज़िम्मेदारी लिए कौन चलता है?

पार्टियों में गर्म गर्म रोटियाँ बनाकर परोसना हो या हम सबकी शादियों में पूरी ज़िम्मेदारी से काकी का फ़र्ज़ निभाना…

सुबह से शाम ऑफिस। साड़ियों का शौक। बेटों को - खासकर छोटे बेटे को ज़्यादा समय न देने का guilt.

इन सबसे फ़ारिद हुईं, तो काकू की आँखों की रोशनी चली गई। काकू के लिए कितना मुश्किल होगा। आसान तो काकी माँ के लिए भी नहीं रहा होगा न?

बड़ी मुश्किल से दोस्तों के साथ एक रोड ट्रिप की और फिर डायलिसिस ने उन्हें फिर कभी कुछ प्लान करने ही नहीं दिया।

मैंने काकी माँ से सुंदर स्त्री नहीं देखी थी। दुर्गा पूजा में जब वो तैयार होकर आतीं तो मेरी आँखें फटी की फटी रह जाती। यहाँ तक कि एक साधारण सी साड़ी पहने, दो चोटी किये हुए भी कभी वो ऑफिस आती तब भी क्यूट लगती थीं। और पिछले कुछ सालों में वही सुंदर काया, हड्डियों का ढाँचा बनकर रह गई थी।

आज से आंटी इस दुनिया में नहीं होंगी। पूरी की पूरी दुनिया में … कहीं भी… कभी भी नहीं मिलेंगी!



Sunday, April 5, 2026

Pairole

​एक अजीब सी घुटन है। क्रिस्टेल ने भी रिजाइन कर दिया। कह रही थी, गाँवों में कुछ समय बिताना चाहती है, उन्हें समझने के लिए।

जब कोई यहाँ से छूटकर अपने मन का काम करने के लिए आज़ाद हो जाता है तो मेरी घुटन और बढ़ जाती है। 

पहले सोचा था बस मिष्टी के यहाँ होने तक। वो कॉलेज चली जाएगी तो मैं भी।

पर ज़िम्मेदारी सिर्फ़ मिष्टी के साथ रहने से आगे बढ़ गई । उसकी पढ़ाई का खर्च, घर लेना है, सुकन्या में अभी कई साल और पैसे भरने हैं। 

काश इतने सबके बाद मिष्टी भी जब मन करे जॉब छोड़कर मन की कर सके।

Am Sure क्रिस्टल के माता पिता ने भी अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी होगी ताकि क्रिस्टेल को न करनी पड़े। 

Monday, March 9, 2026

Bahot Saari Mehnat

​बहुत सारी मेहनत से कुछ नहीं होता! 

चाहिए होता है, बहुत सारा त्याग! 

बहुत सारा साथ और 

बहुत सारा विश्वास! 

आपके हाथ में होती है, बस आपकी मेहनत! 

पर दूसरे का साथ आपके वश में नहीं!

किसी का विश्वास आपके बस का कहाँ?

इसलिए बहुत सारी मेहनत से कुछ नहीं होता!


चाहिए होता है,

बहुत सारा साथ, 

बहुत सारा विश्वास, 

बहुत सारा त्याग !



Wednesday, March 4, 2026

Kavita

​कविताएँ वाहियात लगने लगी हैं 

जैसे झूठी कहानियाँ हो 

झूठे दिलासे हो 

बेवक़ूफ़ों की भाषा हो 

झूठे अरमान, झूठी आशा हो!


कविताएँ वाहियात लगने लगी हैं!


Friday, January 2, 2026

माँ कभी नहीं आ पायीं मेरे घर

मैंने सारा बचपन उनके घर में बिता दिया 
आज भी जाती हूँ हर साल 
पर 
माँ कभी नहीं आ पायीं मेरे घर।