19 April 2026
आज वो चली गईं।
उनके साथ चले गए उनके सारे दुख, दर्द, पुण्य … और शायद तथाकथित पाप भी।
हम गरीब थे। उनके comparison में तो थे ही।
मैंने हमेशा अमीरी गरीबी और क्लास के फ़ासले को याद करते हुए गुड़िया की मम्मी को ही याद रखा। अब सोचती हूँ काकीमाँ को क्यों नहीं याद रखा?
माँ नौवीं पास थीं, काकी माँ ग्रेजुएट, सरकारी नौकरी करने वाली पर बहुत ज़ोर देने पर भी शायद हम में से कोई भी या माँ भी ये याद नहीं कर पाएंगी कि गलती से भी कभी काकी माँ ने उन्हें इस बात का एहसास दिलाया हो।
माँ को वो हर बात बताती थी। सोनू उन्हें BBC बुरा था।
साथ पार्लर जाना, साड़ियाँ ख़रीदने जाना। वो अपनी क्लास की किसी के साथ भी ये सब कर सकती थी ना?
हर बार कर्ज लेना पड़ता था उनसे। ऑफिस आते हुए ख़ुद पैसे लेकर आतीं। काकू फ्री में हमारा इलाज करते थे। सैंपल दवाइयां भी ले आतीं कई बार।
पंचमढ़ी नहीं भी ले जाती हमें तो क्या था। पर जानती थीं कि शायद ही कहीं घूमने का मौक़ा मिलेगा हमें। पीछे मुड़कर देखूँ तो इस तरह ३ बच्चों की ज़िम्मेदारी लिए कौन चलता है?
पार्टियों में गर्म गर्म रोटियाँ बनाकर परोसना हो या हम सबकी शादियों में पूरी ज़िम्मेदारी से काकी का फ़र्ज़ निभाना…
सुबह से शाम ऑफिस। साड़ियों का शौक। बेटों को - खासकर छोटे बेटे को ज़्यादा समय न देने का guilt.
इन सबसे फ़ारिद हुईं, तो काकू…
बड़ी मुश्किल से दोस्तों के साथ एक रॉड ट्रिप की और फिर डायलिसिस ने उन्हें फिर कभी कुछ प्लान करने ही नहीं दिया।
मैंने काकी माँ से सुंदर स्त्री नहीं देखी थी। दुर्गा पूजा में जब वो तैयार होकर आतीं तो मेरी आँखें फटी की गई रह जाती। यहाँ तक कि एक साधारण सी साड़ी पहने, दो चोटी किये हुए भी कभी वो ऑफिस आती तब भी क्यूट लगती थीं। और पिछले कुछ सालों में वही सुंदर काया, हड्डियों का ढाँचा बनकर रह गई थी।
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