एक बार फिर घूमना कैंसिल कर दिया
टिकट्स महंगी थीं
ढेर सारे पैसे बच गए
पर बहुत सारा समय खर्च हो गया
पता नहीं कितना समय और बचा है
उतने समय में क्या कहीं जा पाएंगे हम आदि?
कश्मीर जाकर भी महीनों कहीं एक घर में बैठे रहना और फिर वापस आ जाना - ठीक वैसा ही है ये। दुनिया में आकर भी दुनिया के बस एक कोने में सारा जीवन बिता देना और फिर दुनिया से चले जाना - दुखद है न?
40 साल लग जाते हैं ये समझने में कि दुनिया में ऐसा कोई भी नहीं होता जिसे आपके अपमान पर अपमानित महसूस हो। या शायद ये समझने में कि आपकी किस्मत में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था। या आपको 40 साल तक नहीं मिला तो अब भी नहीं मिलेगा।
दुनिया से उस वक़्त चक्र जाना कितना अच्छा हैं न जब इन चीज़ों की उम्मीद बाक़ी हो। जैसे पल्लवी या राखी!
ये सोचते हुए जाना कि अभी तो बहुत कुछ बाक़ी था पर बस कम्बख़्त ज़िंदगी ही रही!
बजाए कि ये जानते हुए जीते रहना कि हर सपना, हर उम्मीद खोखली होती है।
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