नक़ली नोट
नक़ली दवाईयां
नक़ली घी
नक़ली बटर
और अब नक़ली इंसान बना दिए असली इंसानों ने
बिल्कुल वैसी हँसी
वैसा ग़ुस्सा
वैसी ही भावनायें
इतना सटीक कि पहचाना मुश्किल
नक़ली नोट पर जैसे नक़ली गांधी जी
या नक़ली गवर्नर के हस्ताक्षर
नक़ली की इस भीड़ में कितना मुश्किल हो जाएगा असली रह जाना
नक़ली काया बन जाने से बहुत पहले का यह चलन है यह
कि नक़ली लोग बेहतर नज़र आते असली से
नक़ली की भीड़ में असली गुम हो जाता है
धूमिल हो जाती है उसकी पहचान
क्योंकि कड़क नहीं रह पाता असली नोट नकली की भाँति
सशक्त नहीं रह पता असली इंसान नकली की तरह
वह कभी थकता है, टूटता है, बिखर भी जाता है
पर इंसान को पसंद है विचलित न होने वाले लोग
लगातार बिना थके काम करने वाले मजदूर
बिना सवाल किए हाँ में हाँ मिलाने वाले कर्मचारी
और बिना नागा किए धूप बारिश बरसात में काम पर समय पर आ जाने वाले नौकर
इसलिए नक़ली कामयाब है
इसलिए नक़ली नोट, बटर, घी हो या लोग
ज़्यादा चलते हैं वे
ज़्यादा मुनाफा दिलाते हैं
और असली से ज़्यादा जल्दी अपना साम्राज्य फैलाते है
जीत जाते हैं अक्सर नक़ली
नक़ली बनाते बनाते ये अक्सर भूल जाते हैं असली इंसान!
No comments:
Post a Comment