माँ को लगता है जो रोटा है शोक सिर्फ़ उसी को होता है।
तृप्ति नहीं रोई। उसे ज़रा भी दुख नहीं था। पर शुभो की बहू अच्छी है। फूट फूटकर रो रही थी।
क्या हर व्यक्ति के मर जाने पर हर व्यक्ति को दुख होना चाहिए। क्या बाबू के मर जाने पर माँ को दुख हुआ था?
उनकी मृत्यु के कई साल बाद भी माँ जब भी उनका नाम लेती हैं, घृणा से लेती हैं। उनके बच्चों, यहाँ तक की उनके पोते पोतियों के साथ कुछ बुरा होने पर माँ के अफ़सोस में मुझे एक गुप्त संतोष दिखायी पड़ता है।
आपके साथ कोई बुरा करे तो क्या आप उस सारे बुरे को मृत्यु के साथ ही भूल जाते हैं?
क्या आप रो पाते हैं उसकी मृत्यु पर?
ज़रूरी तो नहीं कि जिस व्यक्ति से आपकी अच्छी यादें जुड़ी हैं, उससे हर किसी की अच्छी यादें ही जुड़ी हों।
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