Wednesday, May 13, 2026

25th Anniversary

​कल रुचि ने बताया की उसकी एक सहेली की शादी की पच्चीसवीं सालगिरह है। सुनकर मैं हैरान हुई कि हमारी उम्र की सहेली की पच्चीसवीं सालगिरह? तो रुचि ने बताया कि लंबी कहानी है। सहेली की माँ ने खुदखुशी कर ली थी। पिता ने दूसरी शादी कर ली और सौतेली माँ ने जल्दी शादी करा दी। रिश्तेदारी में ही लड़का देखकर आनन फ़ानन में करायी हुई शादी थी। 

इसके बाद भी रुचि ने उसकी कई बातें बतायीं। पर जो मेरे मन में घर कर गई वो बात थी - माँ की आत्महत्या। क्यों की होगी उन्होंने खुदखुशी, क्या हुआ होगा। पूछना मैंने ठीक नहीं समझा इसलिए पूछा भी नहीं! 

पर आज एक बात सोचने लगी - आयमहत्या - कितनी लांछन वाली चीज़ होती है न यह। उसकी माँ हार्ट अटैक से मरी होती तो सबको सहानुभूति होती। पर आत्महत्या- सहानुभूति तो होती है पर साथ में सवाल भी खड़े कर देती है।

इसीलिए इतना डरता है इंसान आत्महत्या करने से कि उसके जाने के बाद उसके परिजनों को किसी अपराधी के परिजनों की तरह देखा जाएगा। जो सम्मान नेचुरल डेथ वाले इंसान के परिवार को मिलता है, वो खुदखुशी करने वालीं को नहीं मिलता।

काश हम ये समझ पाते कि हर किसी के बस की नहीं होती ज़िंदगी। जैसे हर किसी के बस की नहीं होती इंजीनियरिंग या डॉक्टरी। फिर भी हम जबरन सबको जिलाना चाहते हैं। तुमसे कई ज़्यादा तकलीफ़ में लोग जी रहे हैं, या ज़िंदगी कितनी खूबसूरत है, वगैरह वगैरह का हवाला देने लगते हैं। 

और फिर क्या? वो पिसता रहता है ज़िंदगी भर एक अच्छी ज़िंदगी जीने के भुलावे में और एक दिन सबकुछ यहीं छोड़कर मर जाता है!

मरकर भी कहाँ जाता है ये आजतक किसी को नहीं मालूम। क्या पता इस स्टेज को पार करके एक और ज़िंदगी हो जिसमें और। कठिन राहे पार करनी हो अगले पड़ाव के लाछ में

No comments:

Post a Comment