सपने ही तो हैं जो हमें मार देती हैं।
हम उम्र भर सपनों के पीछे भागते भागते थक जाते हैं और फिर थककर मर जाते हैं।
हाँ हाँ तर्क ये होगा कि इसके बग़ैर भी तो हम मर ही जाएँगे।
पर शायद थक कर नहीं मरेंगे ना?
बैठे बैठे मर जाने से सपनों के पीछे भागते हुए मरना अच्छा - एक और तर्क।
इन दोनों का ही बैलेंस बनाना है शायद।
ताकि सपने ही न मार दें!
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