Monday, March 9, 2026

Bahot Saari Mehnat

​बहुत सारी मेहनत से कुछ नहीं होता 

चाहिए होता है बहुत सारा त्याग 

बहुत सारा साथ और 

बहुत सारा विश्वास 

आपके हाथ में होती है बस आपकी मेहनत 

पर दूसरे का साथ आपके वश में नहीं 

किसी का विश्वास आपके बस का कहाँ 

इसलिए बहुत सारी मेहनत से कुछ नहीं होता!


चाहिए होता है 

बहुत सारा साथ 

बहुत सारा विश्वास 

बहुत सारा त्याग !



Wednesday, March 4, 2026

Kavita

​कविताएँ वाहियात लगने लगी हैं 

जैसे झूठी कहानियाँ हो 

झूठे दिलासे हो 

बेवक़ूफ़ों की भाषा हो 

झूठे अरमान, झूठी आशा हो!


कविताएँ वाहियात लगने लगी हैं!


Friday, January 2, 2026

माँ कभी नहीं आ पायीं मेरे घर

मैंने सारा बचपन उनके घर में बिता दिया 
आज भी जाती हूँ हर साल 
पर 
माँ कभी नहीं आ पायीं मेरे घर। 


Tuesday, December 30, 2025

माँ पर फ़िल्म

माँ का रोल शबाना आज़मी करेंगी। और बाबा का पंकज कपूर। 
मैं माँ से माँ की कहानी सुनना चाहती हूँ। पर माँ अपनी कहानी में बहुत दयनीय हैं। 
मैं दयनीय कहानी सुनना तो चाहती हूँ।पर नहीं चाहती कि सुनाने वाला अपने आपको दयनीय समझे। माँ की दयनीयता पर हामी भर देने से वह अपने आपको और दयनीय बना लेती हैं। 
बांग्लादेश छोड़ कर भागना, भरी हुई नाव में छोटी बहन की पीठ पर उनकी माँ का शाखा छप जाना। एक बहन को कैम्प की बीमारियों में खो देना। 
बाबा का मिलना। 
घरवालों के खिलाफ़ जाकर शादी कर लेना।
अपने गरीब पिता के लिए चावल ले जाने पर जेठानी से हाथ काट दिए जाने की धमकी सुनना। 
प्रेग्नेंसी के आखिरी दिन धान कूटना।
दादा का छीन लिया जाना। 
चंद्रपुर आकर एक कमरे में संसार बसाना। 
कलसी में लाइन लगाकर पानी भरना। 
रात को बाबा के वापस न आने पर दादा को गोद में लिए पैदल ही उनके फैक्ट्री पहुंच जाना और वहाँ बाबा को 5 रुपये के लिए overtime करते देखना। 
इसके बाद की कहानी में मैं हूँ। 
मेरी कहानी को मैं दयनीय नहीं कह सकती। 
कुछ हिस्से हैं जो नहीं होते तो मेरी कहानी का बचपन, बचपन जैसा सुंदर होता। पर नहीं है। 

Wednesday, December 24, 2025

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था!

तुमने प्रेम की कविताएं भी लिखी थीं 
पर सबने हताशा चुनी 

तुमने लिखा एक अच्छी लड़की के बारे में 
जीवन, छाता, हाथी, साइकिल 
और.... सोनसी को भी 

चुन सकते थे लोग 
तुम्हारी अच्छी कल्पनाओं को 
दीवार की खिड़की के उस पार वाले 
सुंदर, चमकीले, जादुई संसार को 

पानी में तैरती रंगोली, पत्नी के प्रेम और 
माँ के स्नेह को 

चुन सकते थे लोग उम्मीद, हर्ष 
और उत्सव को...

पर सबने हताशा चुनी...

तुमने प्रेम की कविताएं भी लिखी थीं 
पर सबने हताशा चुनी!

तुमने प्रेम की कविताएं भी लिखी थीं 
पर सबने हताशा चुनी 

तुमने लिखा एक अच्छी लड़की के बारे में 
जीवन, छाता,

कीड़े जैसा आदमी

आदमी क्यों कीड़ा नहीं होना चाहता?

क्यों चाहता है शेर होना?
जिसे टिकट लेकर, समय देकर,
देखने आए ढेर सारे कीड़ों जैसे आदमी...

जबकि दोनों ही जानवर हैं-
शेर और कीड़े 

फर्क़ -
कीड़े हर जगह मिलेंगे 
आपके आस-पास, बिना नुकसान पहुंचाये 
अपना-अपना काम करते हुए 
कुछ बिल्कुल अजनबी होंगे 
कुछ आपके काम आ जाएंगे 
कुछ को आप पालना चाहेंगे 
कुछ को आप कुचल भी देंगे 
पर कीड़े ज्यादातर 
आपका कुछ बिगाड़ नहीं पाएंगे 
शायद इसलिए आदमी कीड़ा नहीं होना चाहता 

वो शेर होना चाहता है 
जो उसकी पहुंच से बाहर हो 
जो अपनी भूख मिटाने के लिए 
उसे खा सकता हो 
जिसे काबु करना आसान न हो 
जिसे पाला नहीं जा सकता 
और कुचला तो बिल्कुल भी नहीं 

आदमी अपने आस-पास के सभी कीड़ों 
को नजरअंदाज कर, अपने कीमती समय से समय निकाल, अपनी मेहनत की गाढी कमाई के पैसों से टिकट निकाल, एक दिन शेर देखने की ख्वाहिश रखता है।
 
वो खुद भी एक दिन अपने रोज़ दिखनेवाले कीड़े जैसे जीवन से निकल सिर्फ टिकट पर दिखने वाले शेर बन जाने के ख्वाब देखता है। 

एक दिन बन भी जाता है 
और फिर समझता है कि 
दोनों जानवर ही हैं। 
कीड़े और शेर 
दोनों जी ही रहे हैं 
एक रेंग कर, एक दहाड़कर 

फर्क़ -
एक टिकट लेकर एक को देख रहा है 
और एक बिना टिकट के!

- Manabi Katoch 

Metamorphosis 
Franz Kafka