Monday, June 1, 2026

मानव कौल

​मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ,

पत्रकार या फ़ैन की तरह नहीं,

एक अच्छे दोस्त की तरह।

खाने की मेज़ पर खिखिलाते हुए पुराने दिनों का कोई किस्सा सुनाते हुए…

क्या मैं तुमसे कभी मिल पाऊँगी?

क्या मैं तुम्हारी दोस्त हो पाऊँगी?

इस पूरे जीवन में कभी एक बार 

केवल एक बार? 

Tuesday, May 19, 2026

Diu

​Diu - 18th-19th May 2026

लगा जैसे ये ट्रिप मैंने ऑलमोस्ट किस्मत से छीन कर की थी।

मिष्टी 11th में है। उसकी गर्मी की छुट्टियाँ मुझे पता नहीं क्यों आख़िरी छुट्टियों की सी लगीं। अगले साल 12th, जिसमें शायद वो इतनी बिजी रहे कि शायद हम कहीं घूमने तो क्या, घर पर भी साथ ज़्यादा समय न बिता सके।

दसवीं के एग्ज़ाम्स होते ही हम दोनों कहीं जाना चाहते थे। भैया लोगों के साथ प्रोग्राम बनने भी लगा था लक्षद्वीप का। मिष्टी और पीकू दोनों खुश थे इस डेस्टिनेशन के लिए, पर फिर मिष्टी और पीकू दोनों के ही ट्यूशंस जल्दी शुरू हो गए और आदि को भी छुट्टी नहीं मिली।

फिर तय हुआ कि मई की लंबी छुट्टियों में कहीं चलेंगे। ट्यूशन में भी दो हफ़्ते की छुट्टी थी। पहले मैंने तय किया कि इस बार मैं भी पूरे दो हफ़्ते की छुट्टी लूँगी।

पता नहीं कैसे आदि ने भी कह दिया कि वो भी दो हफ़्ते की छुट्टी ले लेंगे और हम कहीं घूमने जाएँगे।

पर छुट्टियाँ शुरू होने से पहले ही आदि के ऑफिस में टेंशंस शुरू हो गए। वो एक भी छुट्टी नहीं ले पाये।सैटरडे तक की नहीं।

और मैंने ग्यारह साल की नौकरी में पहली बार इस तरह दो हफ़्ते की छुट्टी ली थी। सोचा अकेली ही चली जाऊँगी मिष्टी के साथ। पर हर प्लान विफल!

बरसों बाद श्रद्धा और स्वाति के साथ गोवा का प्लान बना पर टिकट्स महंगी थीं तो अब अहमदाबाद में ही मिलने वाले थे। 

किस्मत पर सच में गुस्सा आ रहा था कि एक छोटी सी इच्छा भी पूरी नहीं हो सकती?

आख़िर दियू का ख़ुद ही प्रोग्राम बना लिया। बस एक दिन का! समंदर किनारे suit बुक किया। टिकट्स बुक की और चल दी मिष्टी के साथ।

अठारह तारीक का आधा दिन और उन्नीस का आधा। जितना हो सका उतना घूमे। खाया पिया, समंदर किनारे लहरों में बैठे, खूब सारी तस्वीरें खींची और खूब सारी यादें इकट्ठी कर वापस आ गए।

अब लगता है कि किस्मत सबको सबकुछ परोसकर नहीं देती। किसी किसी को छीनने का संघर्ष करना ही पड़ता है!

पर छीनकर लेने वाला किसी को अच्छा नहीं लगता। तो क्या किस्मत भी मुझे नापसंद करती होगी?

खैर, न छीनकर कौनसा पसंद कर रही थी? ये भी ठीक है! 

मुझे बस एक बात का डर है आदि कि मैं इन छोटी ख्वाहिशों को पूरा किए बग़ैर ही एक दिन चली जाऊँगी!

मैं दुनिया देखकर, ख़ुश होकर, संतुष्ट होकर जाना चाहूँगी!

1 June 2026 - O Coqueiro

आज अचानक मानव कौल की नई कविता संग्रह - नास्तिक की प्रार्थना पढ़ते हुए, न जाने कैसे दीयू का आख़िरी दिन याद आ गया। चार बजे की फ्लाइट थी। हमारे पास 2:30 बजे तक का समय था। मिष्टी ने गूगल पर एक छोटे से रेस्टोरेंट का बहुत अच्छा रिव्यू पढ़ा था। आते हुए ऑटो वाले ने भी इसका ज़िक्र किया था कि एक कपल इसे चलाता है। छोटी सी जगह है पर खाना अच्छा है। पता नहीं क्यों, मुझे ये उन बिल्कुल ऑथेंटिक जगहों जैसी लगी जो किसी जगह को उसकी ज़मीनी पहचान देते हैं और जहाँ जाए  बिना आप उस जगह की आत्मा को छू नहीं पाते।

पिछली रात भी हमने वहाँ जाने की सोची थी। पर नागोवा बीच से आते आते रात हो गई। पैदल निकलने की सोची पर होटल से बाहर निकलते ही सुनसान घुप्प अंधेरा था। पैदल बस दस मिनट का रास्ता दिखा रहा था तो इसके लिए मुझे ऑटो के 200 रुपये देना बहुत अखरने लगा। फिर तय किया कि अगले दिन दोपहर का खाना वहाँ खा लेंगे। 

तो हाँ चूँकि हमारे पास 2:30 बजे तक का समय था, इसलिए हम सुबह सुबह होटल का शानदार ब्रेकफास्ट करके घोघला बीच निकल पड़े। बहुत शांत, सुंदर और बिल्कुल खाली बीच था। धूप तेज होने के बावजूद, टैन की चिंता किए बगैर, मैंने और मिष्टी ने यहाँ भरपूर समय बिताया। बीच पर ही praveg hotel था। अगली बार यहीं रहने की मंशा से हम होटल देखने के लिए उसमें घुस गए। रेस्टोरेंट देखकर मिष्टी का कुछ पीने का मन कर गया। थोड़ी थोड़ी भूख भी लगी थी पर मेरे दिमाग़ में अब भी उसी आत्मिक रेस्टोरेंट में खाने का लालच चल रहा था। 

पर मैं थोड़ी देर बाद के आनन्द के लिए अभी के सुख की बलि नहीं चढ़ाना चाहती थी। इसलिए हमने एक ही बर्गर लिया और एक ही ड्रिंक।

समय का कैलकुलेशन भी लगातार मेरे दिमाग़ में चल रहा था। 12 बजे होटल पहुँचेंगे। 1 बजे तक तैयार होंगे। और दो बजे तक खाना खाकर वापस होटल पहुँच जाएँगे।

हम बिल्कुल सटीक समय पर चल रहे थे। पर होटल पहुंचकर जिसका मुझे डर था वही हुआ। मिष्टी ने कहा कि वो थक गई है और उसे भूख भी नहीं है। तो क्यों न हम रूम में ही खाना मंगवा लें? उसका सुझाव था कि मुझे दीयू स्पेशल चिकन भी खाना था तो क्यों न मैं वही ऑर्डर कर दूँ? एक बार का तो मैं भी मान गई पर पता नहीं क्यों किसी व्यक्ति से मिलने के बावजूद उसकी आत्मा को न देख पाने का सा दुख सताने लगा। मेरी कश्मकश देख शायद मिष्टी समझ गई और उसने कहा कि ठीक है वो चल लेगी।

होटल कोकेरो असल में इतना दूर भी नहीं था। हमारे महाकाली कोलियरी के घर जैसा एक घर, आगे बहुत बड़ा आँगन, आँगन में लगे चंद टेबल और चेयर, इन्हें छाया देने के लिए बरसों पुराने मनी प्लांट्स - जिनकी लताएँ चारों तरफ़ फैली थीं और जिनकी टहनियाँ किसी पौधे की जड़ों जितनी मोटी और मज़बूत हो गई थीं। चार बिल्लियाँ और एक कपल, जो हमारे आने तक बस यूँही बैठा हुआ था शांति से। 

खाना वाक़ई अच्छा था। हम बिल्कुल समय पर वापस होटल भी आ गए। और बहुत अच्छे से दीयू से भी। एक अजीब सी संतुष्टि लेकर आई मैं। न जाती कोकेरो तो शायद एक टीस लेकर आती।

ये सोचते ही मुझे लगा, हम जीवन को ऐसे क्यों नहीं जीते? क्यों किसी दूसरे के थकने पर अपने सपने अधूरे छोड़ देते हैं? क्यों नहीं हर वो इच्छा पूरी कर लेते , जिसके न करने से एक टीस लेकर जाना पड़े …

वापस आते ही स्वाति और श्रद्धा के आने की तैयारियाँ करनी थी। दीयू की तस्वीरों को ठीक से देखने का समय ही नहीं मिला। परसों याद आया तो देखा कोकेरो की जो एक वीडियो मैंने ली थी वो गायब है। वहाँ के मनी प्लांट्स की लंबी लंबी बेलों की, चार आलस खा रही बिल्लियों की, जर्जर हुई महाकाली वाले घर जैसे नीले पेंट में रंगे घर की और उस शांत जोड़े की।

शायद कैमरा ऑन ही नहीं हुआ था। पर फिर इरफ़ान साहब की बात याद आई। गोगोल की तरह मैं भी इसे कैमरे में नहीं यादों में क़ैद रखूँगी। 


Wednesday, May 13, 2026

25th Anniversary

​कल रुचि ने बताया की उसकी एक सहेली की शादी की पच्चीसवीं सालगिरह है। सुनकर मैं हैरान हुई कि हमारी उम्र की सहेली की पच्चीसवीं सालगिरह? तो रुचि ने बताया कि लंबी कहानी है। सहेली की माँ ने खुदखुशी कर ली थी। पिता ने दूसरी शादी कर ली और सौतेली माँ ने जल्दी शादी करा दी। रिश्तेदारी में ही लड़का देखकर आनन फ़ानन में करायी हुई शादी थी। 

इसके बाद भी रुचि ने उसकी कई बातें बतायीं। पर जो मेरे मन में घर कर गई वो बात थी - माँ की आत्महत्या। क्यों की होगी उन्होंने खुदखुशी, क्या हुआ होगा। पूछना मैंने ठीक नहीं समझा इसलिए पूछा भी नहीं! 

पर आज एक बात सोचने लगी - आयमहत्या - कितनी लांछन वाली चीज़ होती है न यह। उसकी माँ हार्ट अटैक से मरी होती तो सबको सहानुभूति होती। पर आत्महत्या- सहानुभूति तो होती है पर साथ में सवाल भी खड़े कर देती है।

इसीलिए इतना डरता है इंसान आत्महत्या करने से कि उसके जाने के बाद उसके परिजनों को किसी अपराधी के परिजनों की तरह देखा जाएगा। जो सम्मान नेचुरल डेथ वाले इंसान के परिवार को मिलता है, वो खुदखुशी करने वालीं को नहीं मिलता।

काश हम ये समझ पाते कि हर किसी के बस की नहीं होती ज़िंदगी। जैसे हर किसी के बस की नहीं होती इंजीनियरिंग या डॉक्टरी। फिर भी हम जबरन सबको जिलाना चाहते हैं। तुमसे कई ज़्यादा तकलीफ़ में लोग जी रहे हैं, या ज़िंदगी कितनी खूबसूरत है, वगैरह वगैरह का हवाला देने लगते हैं। 

और फिर क्या? वो पिसता रहता है ज़िंदगी भर एक अच्छी ज़िंदगी जीने के भुलावे में और एक दिन सबकुछ यहीं छोड़कर मर जाता है!

मरकर भी कहाँ जाता है ये आजतक किसी को नहीं मालूम। क्या पता इस स्टेज को पार करके एक और ज़िंदगी हो जिसमें और। कठिन राहे पार करनी हो अगले पड़ाव के लालच में।

हम ज़िन्दगी को ख़ुशी से और मृत्यु को दुख से जोड़ते हैं। पर इसका ठीक उल्टा नहीं है?

Saturday, May 9, 2026

समय खर्च हो गया

​एक बार फिर घूमना कैंसिल कर दिया 

टिकट्स महंगी थीं 

ढेर सारे पैसे बच गए 

पर बहुत सारा समय खर्च हो गया 

पता नहीं कितना समय और बचा है 

उतने समय में क्या कहीं जा पाएंगे हम आदि?

कश्मीर जाकर भी महीनों कहीं एक घर में बैठे रहना और फिर वापस आ जाना - ठीक वैसा ही है ये। दुनिया में आकर भी दुनिया के बस एक कोने में सारा जीवन बिता देना और फिर दुनिया से चले जाना - दुखद है न?

40 साल लग जाते हैं ये समझने में कि दुनिया में ऐसा कोई भी नहीं होता जिसे आपके अपमान पर अपमानित महसूस हो। या शायद ये समझने में कि आपकी किस्मत में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था। या आपको 40 साल तक नहीं मिला तो अब भी नहीं मिलेगा।

दुनिया से उस वक़्त चक्र जाना कितना अच्छा हैं न जब इन चीज़ों की उम्मीद बाक़ी हो। जैसे पल्लवी या राखी!

ये सोचते हुए जाना कि अभी तो बहुत कुछ बाक़ी था पर बस कम्बख़्त ज़िंदगी ही रही!

बजाए कि ये जानते हुए जीते रहना कि हर सपना, हर उम्मीद खोखली होती है।



Thursday, May 7, 2026

If Wishes Could Kill

​सपने ही तो हैं जो हमें मार देती हैं।

हम उम्र भर सपनों के पीछे भागते भागते थक जाते हैं और फिर थककर मर जाते हैं। 

हाँ हाँ तर्क ये होगा कि इसके बग़ैर भी तो हम मर ही जाएँगे।

पर शायद थक कर नहीं मरेंगे ना?

बैठे बैठे मर जाने से सपनों के पीछे भागते हुए मरना अच्छा - एक और तर्क।

इन दोनों का ही बैलेंस बनाना है शायद।

ताकि सपने ही न मार दें!

Tuesday, May 5, 2026

माँ भगवान

​माँ होना आसान नहीं होता। अक्सर आपसे कहा जाएगा कि ये बस शुरू के कुछ साल कठिन होता है, क्यूंकि बच्चा न बोल पाता है, न समझ पाता है। पर ये सिलसिला कुछ वर्षों का नहीं पूरे जीवन का है। माँ को भगवान का दर्जा दिया जाना गौरवशाली तो लगता है, पर एचके सचमुच उससे भगवान जैसा बर्ताव चाहते हैं - कि उसे न कभी बुरा लगे, न दर्द हो, वो लगातार निरंतर मुस्कुराती हुई काम करती रहे और सबके मन की बात बिना कहे समझ ले। बच्चे उम्र भर आशा रखते हैं कि माँ उनके बिना कहे सब समझ ले और वो माँ को कभी न समझे। 

हम भूल ही जाते है माँ के पीछे छुपी उस लड़की को, जो दुलार चाहती है, चाहती है कोई उसके मन की समझकर उसके लिए भी किसी दिन उसके मन का पकवान बना दे। चाहती है कि मन न हो तो कुछ भी न करे, बस सारा दिन बिस्तर पर पड़े पड़े टीवी देख ले।

माँ भगवान नहीं होती। और अगर होती भी है तो क्यों नहीं सजाए रखते उसे मंदिर में? 

Thursday, April 30, 2026

नक़ली

​नक़ली नोट 

नक़ली दवाईयां 

नक़ली घी 

नक़ली बटर 

और अब नक़ली इंसान बना दिए असली इंसानों ने 

बिल्कुल वैसी हँसी 

वैसा ग़ुस्सा 

वैसी ही भावनायें 

इतना सटीक कि पहचानना मुश्किल 

नक़ली की इस भीड़ में कितना मुश्किल हो जाएगा असली रह जाना 

नक़ली काया बन जाने से बहुत पहले का चलन है यह 

कि नक़ली लोग बेहतर नज़र आते हैं असली से 

नक़ली की भीड़ में असली गुम हो जाता है 

धूमिल हो जाती है उसकी पहचान 

क्योंकि कड़क नहीं रह पाता असली नोट नकली की भाँति 

सशक्त नहीं रह पाता असली इंसान नकली की तरह 

वह कभी थकता है, टूटता है, बिखर भी जाता है 

पर इंसान को पसंद है विचलित न होने वाले लोग 

लगातार बिना थके काम करने वाले मजदूर 

बिना सवाल किए हाँ में हाँ मिलाने वाले कर्मचारी 

और बिना नागा किए धूप बारिश बरसात में काम पर समय पर आ जाने वाले नौकर 

इसलिए नक़ली कामयाब है 

इसलिए नक़ली नोट, बटर, घी हो या लोग 

ज़्यादा चलते हैं वे 

ज़्यादा मुनाफा दिलाते हैं 

और असली से ज़्यादा जल्दी अपना साम्राज्य फैलाते है 

जीत जाते हैं अक्सर नक़ली 

नक़ली बनाते बनाते ये अक्सर भूल जाते हैं असली इंसान!