कुछ एक दो महीने पहले मानव कौल से मुलाक़ात हुई। उनकी त्रासदी देखने का मौक़ा मिला। उनकी लगभग सारी किताबें मेरे पास होते हुए भी बुक साइनिंग के लिए मैं कोई किताब नहीं लेकर गई थी। भला हो उस अजनबी का जिसने ऐन वक़्त पर मुझे अपनी ‘तुम्हारे बारे में’ दे दी। उसे किताब लौटानी थी सो मैं उसका नंबर ले आई। किसी भी मानव कॉल फैन की तरह उसने मुझसे अपनी पसंदीदा किताब का ज़िक्र किया - तितली। मैंने नहीं पढ़ी थी। हाथ में जो किताब उस वक़्त थी, उसे छोड़ पहले मैंने तितली मंगा ली और पढ़ने लगी।
नाय्या कार्ल को पूरी तरह खो देने का इंतज़ार कर रही थी। मैं नाय्या की कहानी को उस शिद्दत के साथ महसूस नहीं कर पा रही थी जितनी शिद्दत से मानव और शायर कर रहे थे।
पर फिर ओवी की खबर आई। श्रद्धा ने कभी इतनी गंभीरता से उसके बारे में बात ही नहीं की थी कि लगे कुछ गंभीर है। हमेशा लगता था वक़्त के साथ वो ठीक हो जाएगी। एक दफ़ा तो वो चलने भी लगी थी। फिर अचानक पिछले साल श्रद्धा की यूके से वापस आने की जद्दोजहद शुरू हुई। ओवी की कंडीशन की वजह से उन्हें वापस भारत नहीं आने दिया जा रहा था। बड़ी मुश्किलों से वापस आए। तब पहली बार उसने कन्फ़ेस किया था कि अब वो थकने लगी है। भारत में भी सबकुछ आसान नहीं था। फुल्ली ऑटोमैटिक व्हीलचेयर से लेकर केयरटेकर तक - हर मोड़ पर संघर्ष था। पर सारे दोस्त रिश्तेदार आस पास थे ये तसल्ली थी और उनका साथ भी।
नाय्या एक्सेप्ट नहीं कर पा रही थी कि वेंटीलेटर निकलते ही कार्ल नहीं रहेगा। उसी दिन ओवी के लिए भी श्रद्धा को डिसिशन लेना था।
वेंटीलेटर हटते ही ओवी साँस नहीं ले पायेगी शायद। दोबारा वेंटीलेटर पर डालना या नहीं डालने का फैसला श्रद्धा और अक्षय को लेना था।
अगले दिन दशहरा था। माँ को सिंदूर लगाकर विदाई देकर आते हुए मन भारी हो रहा था। कोई कैसे अपने बच्चे को जाने दे सकता है?
ओवी के लिए जीना आसान नहीं है और उसे जीते रहने देने में श्रद्धा का बहुत सारा जीवन छूटता जा रहा है। फिर भी उसे जाने देना - कह देना कि वेंटीलेटर हटा दीजिए - उसकी सांस रुकते हुए देखना - नहीं है ये भी आसान।
जीवन में अपना मुश्किल चुन लेना आसान नहीं होता।
नाय्या की कहानी अभी बाक़ी है। मैं चाहती हूँ श्रद्धा की भी कहानी लंबी हो और जो भी हो अंत वही हो जो कम मुश्किल हो!