Diu - 18th-19th May 2026
लगा जैसे ये ट्रिप मैंने ऑलमोस्ट किस्मत से छीन कर की थी।
मिष्टी 11th में है। उसकी गर्मी की छुट्टियाँ मुझे पता नहीं क्यों आख़िरी छुट्टियों की सी लगीं। अगले साल 12th, जिसमें शायद वो इतनी बिजी रहे कि शायद हम कहीं घूमने तो क्या, घर पर भी साथ ज़्यादा समय न बिता सके।
दसवीं के एग्ज़ाम्स होते ही हम दोनों कहीं जाना चाहते थे। भैया लोगों के साथ प्रोग्राम बनने भी लगा था लक्षद्वीप का। मिष्टी और पीकू दोनों खुश थे इस डेस्टिनेशन के लिए, पर फिर मिष्टी और पीकू दोनों के ही ट्यूशंस जल्दी शुरू हो गए और आदि को भी छुट्टी नहीं मिली।
फिर तय हुआ कि मई की लंबी छुट्टियों में कहीं चलेंगे। ट्यूशन में भी दो हफ़्ते की छुट्टी थी। पहले मैंने तय किया कि इस बार मैं भी पूरे दो हफ़्ते की छुट्टी लूँगी।
पता नहीं कैसे आदि ने भी कह दिया कि वो भी दो हफ़्ते की छुट्टी ले लेंगे और हम कहीं घूमने जाएँगे।
पर छुट्टियाँ शुरू होने से पहले ही आदि के ऑफिस में टेंशंस शुरू हो गए। वो एक भी छुट्टी नहीं ले पाये।सैटरडे तक की नहीं।
और मैंने ग्यारह साल की नौकरी में पहली बार इस तरह दो हफ़्ते की छुट्टी ली थी। सोचा अकेली ही चली जाऊँगी मिष्टी के साथ। पर हर प्लान विफल!
बरसों बाद श्रद्धा और स्वाति के साथ गोवा का प्लान बना पर टिकट्स महंगी थीं तो अब अहमदाबाद में ही मिलने वाले थे।
किस्मत पर सच में गुस्सा आ रहा था कि एक छोटी सी इच्छा भी पूरी नहीं हो सकती?
आख़िर दियू का ख़ुद ही प्रोग्राम बना लिया। बस एक दिन का! समंदर किनारे suit बुक किया। टिकट्स बुक की और चल दी मिष्टी के साथ।
अठारह तारीक का आधा दिन और उन्नीस का आधा। जितना हो सका उतना घूमे। खाया पिया, समंदर किनारे लहरों में बैठे, खूब सारी तस्वीरें खींची और खूब सारी यादें इकट्ठी कर वापस आ गए।
अब लगता है कि किस्मत सबको सबकुछ परोसकर नहीं देती। किसी किसी को छीनने का संघर्ष करना ही पड़ता है!
पर छीनकर लेने वाला किसी को अच्छा नहीं लगता। तो क्या किस्मत भी मुझे नापसंद करती होगी?
खैर, न छीनकर कौनसा पसंद कर रही थी? ये भी ठीक है!
मुझे बस एक बात का डर है आदि कि मैं इन छोटी ख्वाहिशों को पूरा किए बग़ैर ही एक दिन चली जाऊँगी!
मैं दुनिया देखकर, ख़ुश होकर, संतुष्ट होकर जाना चाहूँगी!
1 June 2026 - O Coqueiro
आज अचानक मानव कौल की नई कविता संग्रह - नास्तिक की प्रार्थना पढ़ते हुए, न जाने कैसे दीयू का आख़िरी दिन याद आ गया। चार बजे की फ्लाइट थी। हमारे पास 2:30 बजे तक का समय था। मिष्टी ने गूगल पर एक छोटे से रेस्टोरेंट का बहुत अच्छा रिव्यू पढ़ा था। आते हुए ऑटो वाले ने भी इसका ज़िक्र किया था कि एक कपल इसे चलाता है। छोटी सी जगह है पर खाना अच्छा है। पता नहीं क्यों, मुझे ये उन बिल्कुल ऑथेंटिक जगहों जैसी लगी जो किसी जगह को उसकी ज़मीनी पहचान देते हैं और जहाँ जाए बिना आप उस जगह की आत्मा को छू नहीं पाते।
पिछली रात भी हमने वहाँ जाने की सोची थी। पर नागोवा बीच से आते आते रात हो गई। पैदल निकलने की सोची पर होटल से बाहर निकलते ही सुनसान घुप्प अंधेरा था। पैदल बस दस मिनट का रास्ता दिखा रहा था तो इसके लिए मुझे ऑटो के 200 रुपये देना बहुत अखरने लगा। फिर तय किया कि अगले दिन दोपहर का खाना वहाँ खा लेंगे।
तो हाँ चूँकि हमारे पास 2:30 बजे तक का समय था, इसलिए हम सुबह सुबह होटल का शानदार ब्रेकफास्ट करके घोघला बीच निकल पड़े। बहुत शांत, सुंदर और बिल्कुल खाली बीच था। धूप तेज होने के बावजूद, टैन की चिंता किए बगैर, मैंने और मिष्टी ने यहाँ भरपूर समय बिताया। बीच पर ही praveg hotel था। अगली बार यहीं रहने की मंशा से हम होटल देखने के लिए उसमें घुस गए। रेस्टोरेंट देखकर मिष्टी का कुछ पीने का मन कर गया। थोड़ी थोड़ी भूख भी लगी थी पर मेरे दिमाग़ में अब भी उसी आत्मिक रेस्टोरेंट में खाने का लालच चल रहा था।
पर मैं थोड़ी देर बाद के आनन्द के लिए अभी के सुख की बलि नहीं चढ़ाना चाहती थी। इसलिए हमने एक ही बर्गर लिया और एक ही ड्रिंक।
समय का कैलकुलेशन भी लगातार मेरे दिमाग़ में चल रहा था। 12 बजे होटल पहुँचेंगे। 1 बजे तक तैयार होंगे। और दो बजे तक खाना खाकर वापस होटल पहुँच जाएँगे।
हम बिल्कुल सटीक समय पर चल रहे थे। पर होटल पहुंचकर जिसका मुझे डर था वही हुआ। मिष्टी ने कहा कि वो थक गई है और उसे भूख भी नहीं है। तो क्यों न हम रूम में ही खाना मंगवा लें? उसका सुझाव था कि मुझे दीयू स्पेशल चिकन भी खाना था तो क्यों न मैं वही ऑर्डर कर दूँ? एक बार का तो मैं भी मान गई पर पता नहीं क्यों किसी व्यक्ति से मिलने के बावजूद उसकी आत्मा को न देख पाने का सा दुख सताने लगा। मेरी कश्मकश देख शायद मिष्टी समझ गई और उसने कहा कि ठीक है वो चल लेगी।
होटल कोकेरो असल में इतना दूर भी नहीं था। हमारे महाकाली कोलियरी के घर जैसा एक घर, आगे बहुत बड़ा आँगन, आँगन में लगे चंद टेबल और चेयर, इन्हें छाया देने के लिए बरसों पुराने मनी प्लांट्स - जिनकी लताएँ चारों तरफ़ फैली थीं और जिनकी टहनियाँ किसी पौधे की जड़ों जितनी मोटी और मज़बूत हो गई थीं। चार बिल्लियाँ और एक कपल, जो हमारे आने तक बस यूँही बैठा हुआ था शांति से।
खाना वाक़ई अच्छा था। हम बिल्कुल समय पर वापस होटल भी आ गए। और बहुत अच्छे से दीयू से भी। एक अजीब सी संतुष्टि लेकर आई मैं। न जाती कोकेरो तो शायद एक टीस लेकर आती।
ये सोचते ही मुझे लगा, हम जीवन को ऐसे क्यों नहीं जीते? क्यों किसी दूसरे के थकने पर अपने सपने अधूरे छोड़ देते हैं? क्यों नहीं हर वो इच्छा पूरी कर लेते , जिसके न करने से एक टीस लेकर जाना पड़े …
वापस आते ही स्वाति और श्रद्धा के आने की तैयारियाँ करनी थी। दीयू की तस्वीरों को ठीक से देखने का समय ही नहीं मिला। परसों याद आया तो देखा कोकेरो की जो एक वीडियो मैंने ली थी वो गायब है। वहाँ के मनी प्लांट्स की लंबी लंबी बेलों की, चार आलस खा रही बिल्लियों की, जर्जर हुई महाकाली वाले घर जैसे नीले पेंट में रंगे घर की और उस शांत जोड़े की।
शायद कैमरा ऑन ही नहीं हुआ था। पर फिर इरफ़ान साहब की बात याद आई। गोगोल की तरह मैं भी इसे कैमरे में नहीं यादों में क़ैद रखूँगी।