Wednesday, March 4, 2026

Kavita

​कविताएँ वाहियात लगने लगी हैं 

जैसे झूठी कहानियाँ हो 

झूठे दिलासे हो 

बेवक़ूफ़ों की भाषा हो 

झूठे अरमान, झूठी आशा हो!


कविताएँ वाहियात लगने लगी हैं!


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