माँ होना आसान नहीं होता। अक्सर आपसे कहा जाएगा कि ये बस शुरू के कुछ साल कठिन होता है, क्यूंकि बच्चा न बोल पाता है, न समझ पाता है। पर ये सिलसिला कुछ वर्षों का नहीं पूरे जीवन का है। माँ को भगवान का दर्जा दिया जाना गौरवशाली तो लगता है, पर एचके सचमुच उससे भगवान जैसा बर्ताव चाहते हैं - कि उसे न कभी बुरा लगे, न दर्द हो, वो लगातार निरंतर मुस्कुराती हुई काम करती रहे और सबके मन की बात बिना कहे समझ ले। बच्चे उम्र भर आशा रखते हैं कि माँ उनके बिना कहे सब समझ ले और वो माँ को कभी न समझे।
हम भूल ही जाते है माँ के पीछे छुपी उस लड़की को, जो दुलार चाहती है, चाहती है कोई उसके मन की समझकर उसके लिए भी किसी दिन उसके मन का पकवान बना दे। चाहती है कि मन न हो तो कुछ भी न करे, बस सारा दिन बिस्तर पर पड़े पड़े टीवी देख ले।
माँ भगवान नहीं होती। और अगर होती भी है तो क्यों नहीं सजाए रखते उसे मंदिर में?
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