Thursday, July 30, 2015

हम कौन होते है याकूब की सज़ा तय करने वाले?

30 July 2015

आज सुबह 1993 में हुए मुम्बई ब्लास्ट के लिए ज़िम्मेदार आरोपी याकूब मेमन को फांसी दे दी गयी।
सुना है हमारे देश के कई लोग (जिनका मुम्बई ब्लास्ट के 257 मृतको या 713 पीड़ितों में से किसीसे भी कोई वास्ता नहीं है) इस बात को दुखद मानते है।

कुछ को अपने ही संविधान पे शर्म आ रही है, ये सोचकर की आखिर ऐसे महापुरुष को 22 साल तक पाल पोसकर बूढ़ा करने के बाद दुबारा कोई महान काम करने के लिए छोड़ने की बजाय देश के सर्वोच्च न्यायालय ने फांसी कैसे दे दी।

कुछ इस बात को बेहद निर्मम मानते है की किसीको उसके जन्मदिन पर ही मार दिया जाए।

कुछ कहते है की जब फांसी न देने का कहकर जनाब से इनफार्मेशन ली गयी थी तो देश के इस ईमानदार नागरिक के साथ ऐसा धोखा आखिर क्यों किया गया?

कुछ कहते है की उसके किसी जाती विशेष का होने की वजह से उसके साथ ये नाइंसाफी हुई।

एक भाईसाहब को ये बात भी बुरी लगी की जज ने मनुस्मृति में लिखे एक वाक्य का उदहारण देकर फांसी को न रद्द करते हुए याकूब जी का अपमान कर दिया।

इसी दौरान एक न्यूज़ फ़्लैश और आया.... "जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान ने ceasefire का उल्लंघन कर दिया। एक जवान शहीद!"

किसी ने इस बात पर दुःख नहीं जताया।

किसीको पता नहीं की इस जवान का जन्मदिन कब था।

किसी ने नहीं सोचा की इस जवान का इस उम्र में चले जाना इन्साफ था या नहीं।

किसीको नहीं पता की ये जवान किस धर्म के इंसानो को बचाते हुए शहीद हुआ।

हम ....जो अपने घरो में सुरक्षित बैठे सिर्फ 10-12 न्यूज़ चैनल्स के ज़रिये अपनी राय बनाते है...

हम....जो किसी आतंकवादी को उतना ही जानते है जितना उसके द्वारा सताये हुए पीडितो को....

हम... जो सिर्फ हादसों को तभी हादसा समझते है जब वो हादसा हमारे साथ हो जाता है...

क्या हमे इन हादसों के शिकार लोगो के....हज़ारो जवानो के ...गुनाहगारो के लिए सज़ा तय करने का अधिकार है?

क्या हमें ये तय करने का अधिकार है की एक बेटे से उसकी माँ छीन लेने वाले को.... एक हस्ते खेलते परिवार से उनकी खुशियाँ छीन लेने वाले को सहानुभूति की अमूल्य भेंट दे?

हाँ देश में कई गुनहगार है जिन्हें ऐसी ही सज़ा मिलनी चाहिए। पर क्या याकूब मेमन की सज़ा माफ़ हो जाने से उन्हें फांसी हो जाती? नहीं!
पर हाँ अब सुप्रीम कोर्ट के पास हमेशा एक उदाहरण होगा जिसके बिनाह पे इन जैसो को ऐसी ही सज़ा दी जा सकेगी!
और जहाँ बात धोखे की है तो कई बार भस्मासुर से दुनिया को बचाने के लिए मोहिनी बनकर छल करना ज़रूरी होता है। अपने बचाव में भी वार न करने वाले सांप की कहानी भी तो आपने सुनी होगी!

1993 मुम्बई ब्लास्ट में म्रत्यु को प्राप्त सभी आत्माओ को मेरी श्रधांजलि!!!

Friday, July 17, 2015

आपकी अबीहा....


अब्बु ...क्यों उदास हो
मैं लौट कर आउंगी

जब भी ईद पर सेवइयां बनेंगी
मैं उसकी मिठास बनकर आउंगी

जब भी दो लोग ईद मुबारक कह गले मिलेंगे
मैं उनकी मोहब्बत बनकर आउंगी

सजदे में जो भी झुकेगा
उसकी इबादद बनके आउंगी

अब्बु...क्यों उदास हो
मैं लौट कर आउंगी....

-आपकी अबीहा



Thursday, July 16, 2015

जाना पहचाना अनजाना सा मेरा शहर....

चंद्रपुर! मेरा शहर.. मैंने कभी चंद्रपुर का नाम खबरों में नहीं सुना। खबरे जिनमे अक्सर खून, बलात्कार, धोखाधड़ी और लूटमार के लिये ही जगह होती है, उनमे चंद्रपुर के लिए कोई जगह नहीं थी। सो हम बेफिक्र रहे...हमेशा... सारा चंद्रपुर घर जैसा लगता। उतना ही सुरक्षित जितना घर होता है। सारे लोग उतने ही अपने और नेक जितने घर के लोग होते है।

जब शादी के बाद गुडगाँव में रहने लगी तो माँ हमेशा डरती थी क्योंकि उन्होंने गुडगाँव का नाम अक्सर खबरों में सुना था। सच कहू तो थोडा थोडा डर तो मुझे भी लगता था। चंद्रपुर में रास्ते पर चलते हुए कभी नहीं सोचा की शायद कोई पीछे है जो पर्स छीन लेगा या ज़बरदस्ती मुह बंद करके उठा ले जायेगा। पर कभी गुडगाँव में ऑफिस से आने में देरी हो जाती तो लगता जैसे भेड़िये पीछा कर रहे हो।
इसके बाद भिवाड़ी और नॉएडा जैसे crime capitals में भी रही। इन खबरों में छाए रहने वाले शेहरो से जब भी चंद्रपुर लौटती तो एक सुकून सा मिलता। ऐसा लगता जैसे किसी गटर से निकल कर गंगा किनारे आ गयी हूँ। और गंगा का किनारा तो मैला हो ही नहीं सकता।
पर 32 सालो तक जिन जगहों पर नहीं गयी थी। इस साल उन जगहों के बारे में लिखने की उत्सुकता मुझे वहा ले गयी। इसी सन्दर्भ में अपने इस सुरक्षित शहर के एक अनाथ आश्रम में जाना हुआ। वहा की संचालिका को आने में वक़्त था तो वहा के बच्चों के साथ खेलने लगी। सारी लड़कियां थी। हँसती खेलती बिलकुल भोली भाली लडकियां। छोटा सा खेल था पर उनके ठहाकों की गूंज से लग रहा था मानो उन्हें कोई खज़ाना मिल गया हो।
मैंने सबका नाम पूछा। सबसे हाथ मिलाया। और ढेर सारी हंसी लेकर संचालिका से मिलने गयी।
संचालिका ने सब बच्चों के बारे में बताया। ये भी बताया की कौनसी लडकिया दत्तक दी जा सकती है। जिन प्यारी सी बच्चियो के साथ मैं अभी अभी खिलखिलाकर आई थी, पता चला उनमे से सबसे प्यारी बच्ची दत्तक नहीं दी जा सकती। कारण पूछने पर पता चला की उसके माँ बाप है। बात समझ ही नहीं आई की माँ बाप के रहते हुए 3 साल की दिव्या (नाम बदला हुआ) अनाथ आश्रम में क्या कर रही है?

"उसका बलत्कार हुआ है"
संचालिका के ये शब्द मानो किसी तीर की तरह मुझे चुभे...एक ऐसा तीर जिसके चुभने से मैं अपने शहर के प्रति भरोसे के जिस आसमान पर बैठी थी वहा से सीधा धरती पे आ गिरी!!!
दिव्या का पिता शराबी है और माँ मनोरोगी । दोनों ही भीख मांगकर गुज़ारा करते है और सड़क पर ही सोते है। ऐसे में इस बात की कोई गरंटी नहीं है की दुबारा इस लड़की के साथ ऐसा नहीं होगा। इसलिए पुलिस उसे यहाँ छोड़ गयी थी।
मैं दिव्या से दुबारा मिली...कई बार मिली... वह वैसी ही निष्पाप थी...उतनी ही प्यारी और भोली... पर मैं अचानक बदल गयी। मेरा शहर मेरे लिए हमेशा के लिए बदल गया।
अगले दिन मुझे एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए सोन्डो जाना था। जिस शहर में मैं 32 साल तक अकेले बिना डरे घूमती रही उसी शहर से टैक्सी में अकेले जाने में मुझे खौफ सा आया।
दिव्या से आखरी बार मिलकर घर वापस जाते हुए रास्ते से गुज़र रहा मेरे शहर का हर शख्स अपराधी सा लगा.....

Friday, July 3, 2015

Daadi ki Kahaani


मेरी दादी तभी गुज़र गयी जब मैं सिर्फ दस साल की थी। पर उनकी सुनाई कहानियाँ मुझे अब तक याद है। उनमे से एक किस्सा कुछ इस प्रकार था।
एक बार एक सामाजिक कार्यकर्त्ता एक नए मोहल्ले में रहने आई। उनके पड़ोस वाले घर और उनके घर के बीच एक बहोत ऊँची दिवार थी सो कई दिन गुज़र जाने के बाद भी वो अपने पड़ोसियों को कभी देख नहीं पायी थी। पर रोज़ सुबह जब वे चाय का कप और अखबार हाथ में लिए अपने बरामदे में बैठती तो पड़ोस से ज़ोर ज़ोर से गालियो की आवाज़ आती।
जिज्ञासा वश् समाजसेवी महिला ने दिवार पर कान लगाकर सुना तो समझ आया की रोज़ सुबह पड़ोस में रहने वाली बहु आँगन में झाड़ू लगाती है और वही बैठी उसकी सांस उसे गालियाँ देती रहती है। समाजसेवी महिला को ये सुन बड़ा क्रोध आया। पर उन्होंने सोचा की वे कुछ दिन तक और देखे की क्या होता है। पर ये तो रोज़ का किस्सा था। एक तरफ बहु के झाड़ू लगाने की आवाज़ और दूसरी तरफ सांस का ज़ोर ज़ोर से चिल्लाना "बहु तेरे सत्यानाश हो....बहु तू नर्क में जाये...हाय मेरी फूटी किस्मत जो तुझे घर ले आई" ...वैगारह वैगारह।
समाज सेवी महिला से अब रहा न गया। उसने सोचा की ये बहु कितनी सभ्य और शालीन महिला है की सांस के इतनी गालिया देने पर भी बिलकुल चुपचाप झाड़ू लगाती रहती है। आखिरकार एक दिन समाजसेवी महिला एक सीढ़ी लेकर आई और उस पर चढ़कर दिवार के उस तरफ देखने लगी। पर जो उसने देखा उससे उसकी सिट्टी पिट्टी गुल हो गयी।पड़ोस वाली सांस अपाहिज थी और बरामदे में बैठे बैठे पापड़ बेल रही होती थी। बहु झाड़ू लगाते लगाते बीच बीच में उसे झाड़ू उठाकर मारने के इशारे करती तो कभी पापड़ पर धुल उड़ा देती। जब जब वो ऐसा करती सांस उसे गालियां देती।
इस कहानी से दादी ने हमें ये सीख दी की कभी किसीकी सुनी सुनाई बात पर विश्वास न करे। और बिना सच्चाई जाने किसी के बारे में कोई धारना भी न बनाये।
पर हमारे देश में अक्सर यही होता आया है। हम by default महिलाओ को अबला और भोला ही समझते है।हाल ही में खबर आई की अत्यंत सुसंस्कारी अलोक नाथ जी ने सामाजिक कार्यकर्त्ता कविता कृष्णन जी को 'bitch' कह डाला। और जैसा की हमारे देश के संस्कार है की यदि आप महिला है और किसी पुरुष ने आपको गाली दी तो आप बेझिझक शोर मचा सकती है, चिल्ला सकती है, उस पुरुष की (माफ़ कीजियेगा) माँ बहन कर सकती है। ओपन लेटर्स लिख सकती है। माफ़ी मंगवा सकती है। जी हाँ आपको भारतीय नारी होने की वजह से ये सारी सहूलियते मिली हुई है। आपके आंसू देखके आपकी कहानी छापने आये रिपोर्टर आपसे भूल के भी ये नहीं पूछेंगे की 'माताजी, बहनजी गाली देने जैसा क्या आपने कोई कार्य किया था?"।
पर यदि आप इसी महान देश के एक पुरुष नागरिक है तो आप चाहे प्रधान मंत्री जैसे आदरणीय पद पर भी हो तब भी आपको कोई भी महिला नागरिक "#LameDuckPM" अर्थात "एक नंबर का आलसी" कह सकती है। अरे तो क्या हुआ की कुर्सी संभालने के बाद से आपने एक भी छुट्टी नहीं ली। ना!! हमारे देश की महिलाओ को पूरा अधिकार है आपके लिए किसी भी तरह की भाषा का उपयोग करने का..समझे!!
अच्छा हाँ हमारे यहाँ की महिलाये आपको #SelfieobsessedPM भी बोल सकती है। इसमें बुरा मानने वाली कोई बात नहीं है। आपको सिर्फ इतना याद होना चाहिए की आपको महिलाओं की #respect करनी है। चाहे वो जूता धोकर आपको सरेआम मारे पर आप उनका आदर करते रहे।
ये सारा बवाल हमारे माननीय प्रधान मंत्री जी के मन की बात से शुरू हुआ था। हरयाणा के बीबीपुर जिल्हे के पंचायत श्री सुनील जागलान की तारीफ करते हुए मोदी जी ने उनके चलाये #SelfieWithDaughter के अभियान को देशव्यापी सफलता देनी चाही। इस छोटे सरल और पवित्र अभियान को बेवजह Snoopgate से जोड़ना कहा तक सही था?
हम सब जानते है की गणेशोत्सव पहले सिर्फ घरो में मनाया जाता था।पर स्वराज पाने के लिए लोगो को एकत्रित करना ज़रूरी था और इसलिए माननीय लोकमान्य तिलक जी ने इस उत्सव को सार्वजानिक बनाया।एक देश को चलाने के लिए ...किसी मुहीम को चलने के लिए... उस देश की जनता का एकत्रित होना अनिवार्य है। उनमे उस मुहीम के प्रति जागरूकता तथा सकारकत्मक्ता का होना बेहद ज़रूरी है। #SelfieWithDaughter शायद वैसी ही एक कोशिश थी जिसे देश में ही नहीं विदेश में भी सराहा गया। परंतु कुछ लोगों की नकारात्मक सोच ने इसे एक भद्दा मज़ाक बना दिया।
कविता जी! श्रुति जी! मैं भी उन सब लोगो का पुरज़ोर विरोध करती हूँ जिन्हें मर्यादा में रहकर बात करना नहीं आता। पर मर्यादा किसी लिंग विशेष की ज़िम्मेदारी न मानी जाये तो अच्छा!
अंत में दादी की कहानी के अनुसार आप सब लोगो से विनती है की ये स्वयं तय करे की गाली देती सांस गलत थी या झाड़ू दिखाती बहु???
मानबी कटोच
Published on Mind The News (www.mindthenews.com)

http://www.mindthenews.com/reply-to-shruti-seths-open-letter/

Friday, June 19, 2015

Kuch Nazm Aapki Nazar 2


अंजाम-ए-मोहब्बत से डरता रहा
खुद मोहब्बत न की, औरो की मिसाले देता रहा
डर था उसे मैं नींदे चुरा लूंगा उसकी
तिजोरियों से निकाल निकालकर नींद लेता रहा
#Manabi

काली घटाओ से तुम खौफ न खाया करो
बारिशो का मौसम है, घर वक़्त पर आया करो :)
#Manabi

ये मसरूफियत ये बहाने सब समझते है सनम।
इश्क़ में पहले भी भूले जा चुके है कोई नयी बात नहीं।
#Manabi


मेरे बगैर तन्हा रहने की शिकायत करता रहा।
गैरो की महफ़िल में न जाने किसकी खातिर जाता रहा।
#Manabi


मेरे ख्वाबो में तन्हा आनेवाले
लगता है तुझको मेरी नियत का पता नहीं अब तक
#Manabi



वो कहते थे अपनी पाँव चादर में रखो
आँसमा को चादर समझता था मैं वो ये जानते न थे
#Manabi



पत्थर होता तो जलकर भी साथ निभाता
मोम था मेरा मेहबूब..ज़रा सी लौ से पिघल गया..
#Manabi



फासला इतना रखो की जल न जाओ कही..
मोम हो...मुझसे लिपटने में गल न जाओ कही..
#Manabi




उसकी आँखों में मैं बसता था ताबीर तो होना ही था
मेरी आँखों में ख्वाब बनकर जो रहा हकीकत हो न सका
#Manabi



ग़लतफहमी की यही वजह काफी थी दोस्त
अखबार में अक्सर सिर्फ सूरत छपी तेरी...
नियत ही न छपने पायी
#Manabi



तेरी अपनी हसरत हूँ तेरे दिल के सिवा कही न रह पाउँगा
ठुकरा न मुझको जल्द दिल से निकल हकीकतों में बदल जाऊंगा
#Manabi




भीड़ में रहकर भी न खोने का मज़ा और
अपनी राहो पे रहकर भी भटकने का मज़ा और
#Manabi




रेत का बना हूँ..छूने से डेह जाऊ न कही।
तू मुझे पत्थर समझता है तो पत्थर ही सही।
#Manabi




ताउम्र हिसाब उसके सवालो देता रहा मैं
खुद अपने उधारी का हिसाब माँगा तो रिश्ता बना लिया उसने
#Manabi



हैरानगी है की मुझे जानता भी न था वो
पर सरहद पे जान कर मेरे लिए जान देनेवाला वो अजनबी ही था
#Manabi


खुद पर्दा गिरा के अक्ल पे हमारे
मेहबूब मेरा कहता की हम कुछ नहीं जानते
दर्द के पन्ने पलटकर देखो
फिर कहना की हम कहना नहीं मानते
#Manabi


न मिल मुझसे काली अँधेरी रातो में
डर है मुझे तस्सव्वुर में तू मेरी नींदे न चुराकर ले जाये कही
#Manabi


है तेरे मेरे दरमियान जो
वो अपना राज़ ए ख्वाब है
देखना मेरे हमनफ़ज़ तू किसी को ये बता न दे
#Manabi


मैं उसकी हसरतो का तामील बनने में इतना मशगूल रहा
मेरी चाहत में मरा जाता था वो मुझे मालूम न था।
#Manabi



रातो को सोता न था वो मेरे इंतज़ार में
ख्वाबो में आता रहा मैं उसकी तलाश में
#Manabi



गुफ्तगू तो नहीं बस हाल ही बता देता है वो
सामना रोज़ होता है मगर आइना दिखा देता है वो
#Manabi


आसमाँ पे दिखने लगे है पंछी नए आजकल
लगता है बच्चों को भी अब बड्डपन की तलाश है
#Manabi


मेरी जान से खेलता रहा उम्र भर
मेरे कातिल को अब मेरे दिल की तलाश है
#Manabi


न दोस्तों को न दुश्मनो को ढूंढता हु मैं
कई रोज़ से भूखा हूँ, मुझे रहमदिली की तलाश है
#Manabi


तुम जुगनुओं की तलाश में सितारों को न भुला देना
वो चमकते तो बहोत है, पर जीते नहीं ज़्यादा
#Manabi



कुछ दूर ही सही, तू साथ चलेगा तो निखर जाऊंगा
मुक्कद्दर में न सही, दिल में भी रहेगा तो संवर जाऊंगा
#Manabi


मैं कलम से उनके दिल को छू लूँ न कही
यही सोचकर तलवार उठाये रहते है लोग
#Manabi


नज़दीक जितना भी हो दिल तक न पहोचने पायेगा
तू पहलु में रहे न रहे, दिल से न सरकने पायेगा
#Manabi


अफवाहें तुमने सुनी होंगी मेरे जिंदा होने की
दिल जलाकर कौन जीता रहा है सनम
#Manabi


बिन कुछ पाये लिखनेवाले
अक्सर तुझको पढ़कर सोचता हूँ
तेरे इस न पाने से मैंने क्या कुछ जाना है
#Manabi


कोई किसीकी तरह होता तो मैं जी लेता
किसी भी नाम से हो बस जाम होता तो मैं पी लेता
#Manabi


सदका ए झटको का सफ़र है ज़िन्दगी
जलसा ए हिसाबो की कबर है ज़िन्दगी
#Manabi


मोहब्बत बेशक न करो, नफरत न करना
सोहबत में रहो न रहो यादो में रहना
#Manabi


चाहत पे काश बस मेरा भी होता
मैं फिर यही चाहता की तुझे कोई और चाहता न हो
#Manabi



पत्थर बन गया हूँ तेरे इंतज़ार में
तेरे आने की देर है बस.. दिल के पिघलकर दरिया बनने में
#Manabi


यूँ तो दूर दूर तक नहीं कोई रिश्ता तुझसे ग़ालिब
फिर भी ये गुमाँ है की मेरी ही तरह तू भी बदगुमाँ रहा होगा
दर्द से भरकर जिस तरह छलकता है पैमाना मेरा
इसी तरह तूने भी अपना हर शेर कहा होगा।
#Manabi


















Thursday, June 18, 2015

रवीश को इस्तिफु का जवाब


मेरे प्यारे रवीश
हाँ मैं तुम्हे रवीश ही बुलाऊंगा ; तुमने कभी मुझे जानने की, समझने की कोशिश जो नहीं की।
बस दुसरो की जेब में मुझे ढूंढते रहते हो..कभी खुद भी मुझे अपनी जेब में, या दराज़ में ही रख लिया करो।
पिछले 19 साल से यही... इसी ndtv में लगे हुए हो। तुम क्या जानो राजनीति में नैतिकता के नाम पर मुझे दिए जाने का दर्द?
पांच दिन से तुम्हारे भाई बंधू मेरी मांग किये जा रहे है। कभी सोचा है की यूँही पहले की तरह मांगे जाने पर मैं तपाक से दिया जाता रहा तो मेरी क्या value रह जायेगी? नहीं न? अरे तुम क्यों सोचोगे भाई? तुम्हारी तो खुद की नज़रो में मेरी कोई value ही नहीं है। होती तो आज तक एक बार तो मुझे दिया होता। अच्छा बड़ा कहते हो की मुझे गूगल पर तुमने बहोत ढूंडा। बस रहने दो!! गूगल पर सच्चे दिल से ढूंढने से तो भगवान् और अडवाणीजी भी मिल जाते है, मैं तो फिर भी छोटा सा इस्तीफा हूँ। हाँ वही छोटा सा इस्तीफा जिसे राजकुमार अपनी जेब में लिए फिरते थे।
ना! मोटा तो मैं रत्तीभर भी ना हुआ हूँ। हाँ शातिर ज़रूर हो गया हूँ। इतने सालो में इतना तो तेज़ हो ही गया हूँ की कहाँ मांगे जाने पे दिए जाना है और कहाँ गुपचुप ही जेब में रह जाना है ये खूब समझता हूँ।
मैंने अपने पे लिखी हर कहानी पढ़ी है रवीश बाबू। जैनेन्द्र की भी और गजेन्द्र (किसान) की भी। फर्क सिर्फ इतना है की जैनेन्द्र की कहानी 1937 में लिखी जाने के बावजूद सबको याद है। उस त्यागपत्र को पढ़ तुम भी रोये थे और गजेन्द्र के जीवन से दिए त्यागपत्र को पढ़ सिर्फ मैं रोया था।हर त्यागपत्र के पीछे एक कहानी होती है मेरे दोस्त। तुम्हारे दफ्तर में दिए जाने वाले गुड बाय मेल की भी कोई कहानी होगी। पर उन्हें कोई नहीं पढता क्योंकि उनकी हफ्ता दर हफ्ता मांग नहीं होती।
खैर तुम्हारा पत्र मैंने दो बार पढ़ा जैसा तुमने कहा था। हंसी भी आई पर मैं हँसते हँसते कम ही निकलता हूँ ये तुम्हे पता होना चाहिए था। अक्सर मैं मायूस होकर ही निकल पाता हूँ।
मैंने तो तुम्हारा पत्र सब दोस्तों में शेयर किया। तुम भी मेरा ये जवाब शेयर करोगे न?
तुम्हारे हाथ से किसी दिन लिखे जाने की चाह रखने वाला
तुम्हारा
इस्तिफु :)

(रवीश जी का इस्तीफ़ू को पत्र कुछ इस तरह था....

इस्तीफ़ू तू बड़ा ही 'नॉटी गेम चेंजर' है - NDTV http://khabar.ndtv.com/news/blogs/ravish-kumar-dear-resignation-plz-read-my-letter-twice-773172 )

Sunday, May 10, 2015

Kabhi Meri Ghazale Bhi Padha Karo!

तुम खबरे पढ़ते पढ़ते मानो इन खबरों से ही बन गए हो।
कभी चहकते ही नहीं ...बस मायूस से हो गए हो।
उठते ही बलात्कार और खून की बाते करते हो..
रेल दुर्घटनाओ के बारे में पढ़ पढ़कर साईकल पे भी बैठने से डरते हो।
पिछले दिनों सलमान कांड से इतने प्रभावित हुए...
की फूटपाथ पर बैठे लोगो को हेलमेट गिफ्ट कर दिए।

राहुल बाबा के छुट्टी के बाद वाले भाषण सुनके खुदको कोसने लगते हो..
मोदी को वोट आखिर क्यों दे डाला दिन रात सोचने लगते हो।
इन सब से ऊब जाओ तो तीसरा पन्ना खोल लेते हो..
उनपर सितारों को चमकता देख..
खुदको भी घिसने लगते हो।

अखबार बहोत हुआ कहकर फिर t.v का रुख होता है..
बरखा दत्त , अर्णब की बेफुज़ूल की बहस सुना जाता है..
रजत शर्मा, राजदीप के सवालो से अपने ही दिमाग का दही करते हो।
रवीश की रिपोर्ट देख सच्चाई का दम भरते हो।

जानती हूँ तुम इन सब अखबारो और न्यूज़ चनेलो से अब थक गए हो
तुम खबरे पढ़ते पढ़ते मानो इन खबरों से ही बन गए हो।
कभी चहकते ही नहीं ...बस मायूस से हो गए हो।

कई बार सोचती हूँ तुमसे कहू...
सुनो! इन खबरों से यूँ मायूस न हुआ करो..
मायूस करने वाले इन खबरों की चंगुल से निकलकर...
कभी मेरी ग़ज़लें भी पढ़ा करो!!!
मेरी गज़ले तुम्हे जीने का सबब देंगी..
कुछ और करे न करे तुम्हे मायूस तो न करेंगी।
तुम उन्हें पढ़कर इक सुकून की सास लेना...
रोती हुई आँखों से इक बार फिर मुस्कुरा देना।