अकेला रह गया था वह पेड़।
आस-पास के उसके सभी साथियों को काटकर सड़क बना दी गई थी।
न मालूम क्यों उसे छोड़ दिया गया।
वो अक्सर अकेला खड़ा सोचता रहता।
कई बार सोचते-सोचते ऊँघने लगता।
पर कोई गाड़ी टक्कर मार जाती और उसकी नींद टूट जाती।
गाड़ीवाला भर-भर गालियाँ देता -
“अरे हद है! रास्ते के बीचों-बीच कौन छोड़ता है ऐसे पेड़ को? किसी दिन कोई भयानक एक्सीडेंट हो जाएगा तो कौन ज़िम्मेदार होगा?”
“पीडब्ल्यूडी का काम है” - जमी भीड़ में से एक ने कहा।
“फॉरेस्ट डिपार्टमेंट से क्लीयरेंस नहीं मिली होगी” - दूसरा बोला।
“सिर्फ़ एक पेड़ का क्लीयरेंस नहीं मिला? और जंगल का मिल गया?” गाड़ीवाला हतप्रभ होकर बोला।
पेड़ चुप खड़ा रहा और फिर सोच में डूब गया -
“सच, सिर्फ़ मेरी फ़िक्र थी फॉरेस्ट वालों को? कुछ तो सोचते कैसे कटेगी ये ज़िंदगी अकेले, इंसानों और उनकी गाड़ियों के शोर से भरी इस कठोर सड़क पर?”
कुछ साल बीते, आसपास मकान-दुकान बन गए।
पूरे इलाके में वही एक पेड़ था,जिसपर अब आसपास रहने वाले कभी तेल चढ़ा जाते, कभी हार, तो कभी दिया जला जाते।
और फिर एक दिन चुनिया चाची को अपने मंदिर की सफ़ाई करनी थी।
पुराने भगवान जी को अलविदा कहना था और नए नवेले शिव लाने थे।
फेंकने से पाप लगता, तो भगवान को उस इकलौते पेड़ के नीचे छोड़ आई।
आने-जाने वाले उस पर फल,फूल,मिठाई छोड़ जाते।
स्त्रियां ‘वट सावित्री’ वाले दिन धागा बांध जातीं।
फिर किसी की नज़र पड़ी और पेड़ के आसपास चबूतरा बन गया।
कुछ दिनों में एक मूर्ति रख दी गई।
और अगले कुछ दिनों में मंदिर बन गया।
अब रोज़ १००-२०० भक्त आते हैं। खूब कमायी होती है।
पर पेड़ अब भी अकेला है।
आज भी सोचता है - “काश मैं वट नहीं होता, तो कट जाता!
या काश मेरे आस-पास सब वट होते!”
कटे जाने से बचने के लिए पेड़ को वट होना पड़ता है। पर वट अक्सर अकेला पाया जाता है!
इसलिए..
अकेला रह गया था वह पेड़।
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