Thursday, March 23, 2017

Main apni baat kahu to kya doge?

Main apni baat kah bhi du to kya doge?

Bejhijhak bebak ban bhi jau to kya doge?

Tum mujhse mere hone ka

Main janti hun hakk cheen loge!

Main tumse apni baat kah bhi du to kya doge?

Main rafta rafta jeene ka ... Gur seekh rahi hun ...mat toko

Main chup rahkar sab sahne ka ...gur seekh rahi hu...mat roko

Tum kahte ho bebaak raho

Jo dil me aaye wo kaho..

Main dil ki baaton ko dafn karne ka gur seekh rahi hu...mat toko

Main tumse sab kuch kah bhi du

Main zinda hun ye saabit kar bhi du

Tum mere zinda hone se kya ghanta mujhse ittefaq karo

Tum mere sach kah dene se kyu ganga me ja doob maro

Sach ye ki tum jhoothe ho..

Sach ye hai ki tum nange ho

Sach ye hai ki tumse mera mazhab na bardaasht hua na hoga kabhi

Sach ye hai main gar sach kah bhi du... Tum sharm ka chaadar de doge

Sach ye hai us chaadar ki aad me tum meri achchi tarah le loge...

Sach ye ki main sach kah du to tum sab hoth see loge

Fir tum hi kaho...main apni baat kah bhi du ...to tum sab mujhko kya doge?

Tum doge ik bhookha bachpan, tum doge ik nanga yauvan, tum doge galiyan do chaar aur tum doge bhar bhar bhrashtachar, tum doge naari ka darpan, tum doge ammaran anshan, tum doge wahi galgal sarkaar, tum doge wahi deh vyapar, tum doge rashan ki line, tum doge signal par fine, tum doge mahangayi ka khel, tum doge do partiyon ka mel, tum doge twitter ki war , tum doge facebook ka sansaar.

Jab wahi doge jo dete aaye ho to main kya naya kahu....aur tum kya naya laye ho...

Chalo fir bhi....Main apni baat kah bhi du to kya doge? 

Wednesday, February 22, 2017

मुझे बेतरक़ीब रहने दो!

मुझे बेतरकीब रहने दो..
मुझे तुम्हारी तरकीब से जीना नहीं आता।

कि रातों को देर तलक नींद नहीं आती
सुबह को जल्दी उठना नहीं आता...

न नहाना लाजमी लगता है,
और बेवजह संवरना नहीं आता।

मैं दिल की सुनके मुफ्त में भी लिखती हूँ.
मुझे तुम्हारी तरह बेमन से कमाना नहीं आता।

औरों की तरह बन जाओ दुनिया बेशक ये कहती हो,
औरो की तरह बनकर घुंट भी जाऊँ, तो बचाने को ज़माना नहीं आता।
- मानबी

Friday, December 30, 2016

तू किसी रेल सी गुज़रती है

तू किसी रेल सी गुज़रती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ।

याद आया ये किसकी कविता है?
आप कहेंगे, "कविता?..ये तो मसान फिल्म का गाना है।"
पर क्या आप जानते है कि वरुण ग्रोवर के लिखे इस गाने की पहली दो लाइने जो आप सबसे ज़्यादा गुनगुनाते है वो कवि दुष्यन्त कुमार की ग़ज़ल से ली गयी है।

अभी हाल ही में 'हिंदी कविता' नामक लोकप्रिय यूट्यूब चैनल पर दुष्यन्त कुमार की पोती ने इस कविता को पढ़ा। पर पढ़ने से पहले ये नहीं कहा कि ये उस दुष्यन्त कुमार की कविता है जिसने ऐसी कई खूबसूरत कविताएं लिखी है। दुष्यन्त कुमार को हमसे मिलवाने के लिए उनकी पोती को मसान का सहारा लेना पड़ा। कहना पड़ा कि ये जो गाना आप लोगो को पसंद आया, ये दरअसल मेरे दादा की कविता है जिसे तब तक अपनी अलग पहचान नहीं मिली जब तक बॉलीवुड ने इसे अपनी एक फिल्म में जगह नहीं दे दी।

कैसी विडम्बना है न हम जैसे कवियों की ...हमारी कविताओं की। हम तब तक गुमनाम रहते है जब तक हम गुलज़ार या जावेद अख्तर नहीं बन जाते या फिर हमारे मरने के कई साल बाद कोई कवि ,कोई गीतकार हमारी कविता के कुछ अंश लेकर किसी फिल्म का गाना नहीं बना देता।

खैर! आज दुष्यन्त कुमार की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए... आईये सुनते है उनकी ये कविता, जो वास्तव में कुछ इस प्रकार है -

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ 

एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ 

तू किसी रेल-सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ 

हर तरफ़ ऐतराज़ होता है
मैं अगर रौशनी में आता हूँ 

एक बाज़ू उखड़ गया जबसे
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ 

मैं तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ 

कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ

Saturday, December 17, 2016

कभी कभी माँ बहुत उदास होती है!

कभी कभी माँ बहुत उदास होती है
कुछ कहती नहीं ...बस चुपचाप होती है
कभी कभी माँ बहुत उदास होती है।

बहुत पूछने पर धीमे से कहती है
आज जोड़ो का दर्द तेज़ है..
और कोई बात नहीं।

तू सुना...मुन्नी स्कूल गयी?
तूने नाश्ता किया?
दामाद जी टूर से लौटे?
कई सवाल एक साथ कर लेती है
कभी कभी माँ बहुत उदास होती है।

बाबा की सेवा, घर की सफाई,
मेहमानों से बातचीत, डॉक्टर के चक्कर
इन सबसे फुर्सत मिलते ही मुझे फ़ोन लगाती है
कभी कभी माँ बहुत उदास होती है।

कुछ कहती नहीं..बस चुपचाप होती है
कभी कभी माँ बहुत उदास होती है।

Monday, December 12, 2016

दांत का दर्द

मेरे दांत में काफी समय से दर्द था। असहनिय तो नहीं था पर एक लंबे समय से इस एक सार दर्द से मैं ऊब चुकी थी। हारकर आखिरकार डॉक्टर के पास गयी। पर डॉक्टर ने जानबूझकर कहिये, अनजाने में मानिये या फिर गलती से मेरे दांतो का और बुरा हाल कर दिया।
दर्द अब असहनीय हो चूका था। कई महीनो तक इस दर्द के साथ रहने के बाद आखिर एक दिन उस दांत को निकलवाना पड़ा।
आजकल एक और दांत में दर्द है। पर पिछले का ज़ख्म अभी तक भरा नहीं.... मुझे अब डॉक्टर के पास जाने से खौफ आता है।

Wednesday, December 7, 2016

परिंदा!

कभी कभी जो ख्वाहिश आसमान में उड़ते हुए परिंदे को देखकर होती है, अक्सर दूर से किसी की ज़िन्दगी को देखकर वैसी ही एक ख्वाहिश होती है। कि काश मैं उसकी तरह ऊंचा उड़ पाता। कि... वाह क्या उड़ान है उसकी... क्या ज़िन्दगी है। न रोक न टोक... न ज़िम्मेदारियाँ .. न मजबूरियां... बस जहाँ दिल करे, जब दिल करे उड़ते रहो...
पर वही परिंदा शायद आपको देखकर सोचता हो... कि वाह! क्या लाइफ है बन्दे की... न खाने की तलाश में जगह जगह उड़ते रहने की टेंशन.. न घरोंदा बनाने के लिए तिनको की

Monday, November 21, 2016

बोल कि लब आज़ाद है तेरे!

चाहे आप भक्त हैं या एंटी नैशनल
चाहे आप सरकार की हर हाँ में हाँ मिलाते है या हर दांव का पेच ढूंढते है!
चाहे आप केवल फेसबुक पर ग्राउंड रियालिटी चेक करते है या 
ग्राउंड पर जाकर भी सच नहीं देख पाते है!
चाहे आप ज़ी और सुदर्शन न्यूज़ देख कर अपना सच तय करते है या टाइम्स और एनडीटीवी के भरोसे बैठते है!

आप चाहे जो भी है.... बोलिये.. बोलते रहिये... यहाँ ...इस स्पेस पर लिखते रहिये। क्योंकि आज़ाद है आप। आपसे बोलने-लिखने का हक़ कोई नहीं छीन सकता। 

पर कुछ करने का अधिकार न जाने कौन छीन ले गया... है न?
इसलिए न भक्त कुछ करता है, न एंटी नैशनल। ये दोनों सिर्फ बोलते है। एक दूसरे पर बोलने के अधिकार की धांक़ जमाते है। और इन दोनों के बोलने का मुद्दा भर बना वो - जो भक्त है न एंटी नैशनल, न संघी है न लिबरल... वो कतार में लगा रहता है ... इस उम्मीद से कि बोलने की आज़ादी रखने वाले ये फ़ेसबुकिया लोग एक दिन अपने कुछ करने की आज़ादी का दम भी भरेंगे और इनके लिए ग्राउंड पर कुछ करेंगे।
फिर भी बोलते रहिये.....