Wednesday, April 27, 2016

Ore Grih Bashi - Rabindra Sangeet

Ore grihobashi, khol, dwar khol, laglo je dol. 
Sthale jale banotale laglo je dol. 
Dwar khol, dwar khol. 

Ranga haashi raashi raashi ashoke palashe, 
Ranga nesha meghe mesha probhato aakashe, 
Nobino pataye laage ranga hillol. 
Dwar khol, dwar khol. 

Benubano marmare dokhino batashe, 
Prajapati dole ghaashe ghaashe. 

Moumachhi phire jaachhi phuler dokhina, 
Pakhaye bajaaye taar bhikharir bina, 
Madhobibitane baayu gandhe bibhol. 
Dwar khol, dwar khol.

ওরে গৃহবাসী খোল্, দ্বার খোল্, লাগল যে দোল। স্থলে জলে বনতলে লাগল যে দোল। 
 দ্বার খোল্, দ্বার খোল্॥ 
রাঙা হাসি রাশি রাশি অশোক পলাশে, রাঙা নেশা মেঘে মেশা প্রভাত-আকাশে, নবীন পাতায় লাগে রাঙা হিল্লোল। 
দ্বার খোল্, দ্বার খোল্॥ 
বেণুবন মর্মরে দখিন বাতাসে, প্রজাপতি দোলে ঘাসে ঘাসে। 
মউমাছি ফিরে যাচি ফুলের দখিনা, পাখায় বাজায় তার ভিখারির বীণা, মাধবীবিতানে বায়ু গন্ধে বিভোল। 
দ্বার খোল্, দ্বার খোল্॥ 

Translation 
O home dweller open thy door for carnival of colors 
Colors have struck on land, water and on forest floors. 
Open thy door 

The trees of rain forests and flames of forests have lit up in smiles. 
Colors of ecstasy of clouds too were spread across the morning skies. 
On new leaves too struck the shivers of ardor. 
Open thy door 

The southern breeze murmurs in bamboo coppices. 
The butterflies dance and sway in grasses. 
The fruit-flies call for new order. 
With buzz of wings they play alike lute of beggar. 
The Rangoon creepers souse 

http://anondogaan.blogspot.in

Monday, March 21, 2016

कविता भूल गए।

दसवी में जब हमें पछत्तर पर्सेंट मिले
तो माँ बाबा के उम्मीदों के कई दीप जले।

हमारी रूचि को तब मिट्टी में मिलाया गया
और हमे साइंस में एडमिशन दिलाया गया।

माँ बाबा की खातिर हम भी खूब पढ़े
और बारवी से भी किसी तरह निकल पड़े।

सोचा ...चलो अब साइंस से पीछा छुटा
आराम से अब साहित्य का मज़ा जाए लूटा।

पर बाबा को मुझे इंजीनियर बनाना था
अच्छा वर पाने के लिए डिग्री जो लाना था।

इंजीनियरिंग में घुसते ही हमारी कविताओ का सारा रस निकल गया,
धरती माँ - प्लानेट और चंदा मामा - सॅटॅलाइट में बदल गया।

वर्कशॉप मशीनों का मेला था
पर हर शख्स अपनी मशीन के साथ यहाँ अकेला था।

आर ए एम् राम नहीं रैम बन गया
ये सुनके तो हमारा भक्ति भाव ही खो गया।

जब इन सबके बावजूद हम साहित्य प्रेमी बने रहे
तो इतने असाइनमेंट्स और ट्यूटोरियल दिए गए
कि हम दुसरो की क्या...अपनी भी कविता भूल गए।

हाँ हम अपनी भी कविता भूल गए :D

Saturday, March 19, 2016

मेरे चेन्नई के घर से सटे छत को आखरी ख़त!

बस कुछ दिन और... फिर जाना होगा। तुम बहोत याद आओगे।
अच्छा तुम्हे मेरी याद आएगी? अब कौन आएगा घंटो तुम्हारे साथ चाँद को एक छोर से दूसरे छोर जाता हुआ देखने? कौन रबिन्द्र संगीत सुनते सुनते, खुद गाकर तुम्हे भी सुनाने लगेगा... याद है?.... " तोमार खोला हवाए..." और वो... "आमारो पोरानो जाहा चाय... तुमी ताई.."

शोत्ती... तुमी ताई छिले!!

नीचे से जब उस दिन बाढ़ आ जाने पर सारा सामान ऊपर ले आये थे तो सब मजबूरी सा लग रहा था। पर अब... अब लगता है काश शुरू से यही होते। कितनी बेवकूफ थी मैं... चंद सीढियाँ चढ़ने के डर से नीचे के मकान में रही... जहां से न चाँद दिखता था न चिड़ियों की आवाज़ सुनाई देती थी।

यहाँ आई तो तुम मिले। शाम को वो मंदिर की घंटीयो के बीच मस्जिद की आज़ान... मानो आसमान तक पहोच रही होती थी। मंत्रो और अल्लाह.... की पुकार एक साथ... तुम न होते तो कैसे सुनती।

वहाँ?? हाँ वहाँ पार्क है, खुला लॉन है पर तुम तो नहीं हो न। तुम जो सिर्फ मेरे थे.. तुम्हारे ऊपर जितना आसमान था वो पूरा का पूरा मुझे अपना लगता था। जैसे मेरा हिस्सा हो जो वसीहत में मेरे लिए लिखी गयी हो। पार्क या लॉन का आसमान तो हर किसी का होगा। वहाँ किसे सुनाऊँगी रबिन्द्र संगीत? कौन देगा मेरा साथ अल्लाह की आज़ान और भगवान् के श्लोक मिलाने में?

Tuesday, March 8, 2016

इक मुखौटा सा है जो हम पहनते है...

इक मुखौटा सा है जो हम पहनते है,
और पहनकर बाजार में बिकने निकल पड़ते है।

कोई मुस्कान खरीदता है
कोई मासूमियत
कोई झूठी पहचान खरीदता है,
कोई खोखली नियत

कोई हंसने के दाम देता है
कोई चलते रहने का इनाम
कोई अच्छी बाते खरीद लेता है
तो कोई झूठी शान...

इक मुखौटा सा है जो हम पहनते है!

मुखौटा खुलते ही खरीददार रूठ से जाते है,
मुस्कान, बाते, नियत, शान सब लौटाने आते है,
असली चेहरा इक बार फिर बाजार में बेच नहीं पाते है..
और अगली सुबह फिर वही मुखौटा पहन हम बाजार में बेच आते है...

इक मुखौटा सा है जो हम पहनते है!

Sunday, March 6, 2016

रिफ्यूजी

"वो लोग मामा के घर में घुस चुके थे। सब भागने लगे... मैं भी भागा.... । मामा का घर 3 गाँव छोड़कर था, हम भागकर ही पहुँच जाते थे, जब मन करता। पूरा रास्ता याद था पर उस दिन मैं डर गया था..कुछ 11-12 साल का था मैं तब। भागते भागते नदी किनारे पहुँच गया पर कच्ची पुल पर से चलने में डर लगने लगा... इतने में दादा (मामा का बेटा) ने पीछे से आकर मुझे पकड़ लिया और मुझे घर पहुंचा दिया। कुछ दिनों बाद वो लोग हमारे गाँव में भी आ गए। लोगो को चुन चुन के मारने लगे। औरतो को उठाकर ले जाने लगे। हम सब छोड़कर भाग आये।" - बाबा

मेरे बाबा उन सैंकड़ों बच्चों में से एक थे जिन्हें बांग्लादेश की आरामदायक ज़िन्दगी को रातो रात छोड़कर भारत में रिफ्यूजी की तरह भाग आना पड़ा। आज भी उनकी पहचान रिफ्यूजी की तरह की जाती है। बांग्लादेश में ज़मींदारों की तरह रहने वाले इन लोगो को महाराष्ट्र के सबसे बंजर इलाके में 5 -5 एकड़ ज़मीन दे दी गयी। बिना किसी आरक्षण या सहूलियत के इन सभी लोगो ने अपनी ज़िन्दगी एक बार फिर शून्य से शुरू की।

पर आज जितने भी रिफ्यूजी बंगालियों को मैं जानती हूँ उनके बच्चे अपनी मेहनत से पढ़ लिखकर सबके बराबर खड़े होते है।

इस समुदाय ने न तो कभी आरक्षण माँगा और न ही इस बात का हवाला दिया कि उन्हें रिफ्यूजी समझकर उनके साथ भेदभाव किया जाता है।

मैंने कई बार बाबा को अपने बांग्लादेश के दिनों को याद करते हुए सुना... उनपर हुए अत्याचारो की कहानियां सुनी पर आज तक कभी भारत के खिलाफ कुछ भी कहते नहीं सुना।

मूलतः बांग्लादेशी होते हुए भी उन्हें अपने भारतीय होने पे उतना ही गर्व था और है जितना किसी भी भारतीय को होना चाहिए।

वे सुभाष चंद्र बोस के भक्त रहे... उनके गुम होने के लिए महात्मा गांधी और नेहरू से नफरत करते रहे पर उन्हें भारत से कभी कोई शिकायत नहीं थी। उन्होंने या उनके साथ आये रिफ्यूजी परिवारो ने कभी भारत विरोधी नारे नहीं लगाये।

हम सभी समझते थे कि आरक्षण एक राजनितिक खेल है, जो कभी ख़त्म नहीं हो सकता। चाहे कोई भी राजनीतिक पार्टी आ जाये.. न आरक्षण बदलेगा न समानता आएगी इस देश में। पर इस असामनता के बीच, रिफ्यूजी होने की हीनता लिए और खाली जेबो को लिए हम संघर्ष करते रहे। और तब तक नहीं रुके जब तक लोगो को हमारी शिक्षा और सामाजिक स्तर से हमारा इतिहास भूल जाना पड़े।

हमने भारत से आज़ादी नहीं मांगी... हम भारत में रहकर, भारतीय बनकर वहां पहुचे जहाँ भारत को हम पर गर्व हो... जहाँ भारत पर हम आरक्षित बनकर बोझ नहीं बल्कि सक्षम बनकर उसकी प्रगति के प्रतीक बने।

Sunday, February 21, 2016

Anne Frank- The Diary of a young girl!

Anne Frank - एक ऐसा नाम जो कई दिनों तक मेरे दिलों दिमाग पर हावी रहा। एनी की डायरी किसी भी आम लड़की की डायरी की तरह ही थी। मुझे याद है मेरी एक दोस्त ने इसे पढ़ने के बाद कहा था कि पढ़ते वक़्त उसे लगता था कि वो किट्टी है। पर एनी की डायरी पढ़ते हुए मुझे कई बार ..बल्कि हर बार यही लगता कि मैं ही एनी हूँ। बचपन में मैं भी इसी तरह डायरी लिखती। माँ से नाराज़ होने की बाते लिखती। अपनी सोच , अपने सपनो को उन पन्नों पर संजोती। फर्क सिर्फ इतना है कि एनी की डायरी उसके मृत्यु के बाद मिली और मेरी... मेरे ज़िंदा रहते हुए ही पकड़ी गयी। और इसीलिये एनी की डायरी अमर हो गयी और मेरी इतिहास बन गयी।
खैर... एनी की डायरी पढ़ने पर हो सकता है आपको और कुछ महसूस न हो सिवाय एक 13 साल की लड़की के बिना किसी दोष के छुपकर रहने की घुटन के।  पर एनी की डायरी के साथ साथ आपको वो भी पढ़ना चाहिए जो उसके हायडिंग में रहते हुए बाहर हो रहा था और वो भी जो उसके डायरी के आखरी पन्ने को लिखने के बाद हुआ।
एनी और उसके निर्दोष परिवार को इसके बाद कंसंट्रेशन कैंप में ले जाया गया। उसने अपने पिता को इसके बाद फिर कभी नहीं देखा। उसे, उसकी माँ और बहन को निर्वस्त्र करके उनके बाल काट दिए गए। उसकी माँ भूख से मर गयी। और 15 साल की उम्र में अपनी बहन को अपनी आँखों के सामने मरता हुआ देखने के कुछ दिन बाद एनी भी भूख और बिमारी (typhus) से मर गयी।
होलोकास्ट की कहानियों का अंत नहीं है। बहुत कम लोग जो इस भयावय अनुभव के बाद भी अपने आपको ज़िंदा रख पाये वो पूरी ज़िन्दगी इसकी दहशत से निकल नहीं पाये।
एनी के परिवार की ही तरह लाखो लोगो को तड़पा तड़पा के मारा गया। हज़ारो की तादात में लोगो को गैस चैम्बर में ले जाते... घंटे दो घंटे तक उनकी चीखे सुनाई देती और फिर सब शांत हो जाता।
खुद को ज़िंदा रखने के लिए लोग दूसरे लोगो के मरने का इंतज़ार करते ताकि उनके मृत शरीर से कपडे चुराकर अपने आपको ठण्ड से बचा सके।
कभी एक खुशहाल और खूबसूरत ज़िन्दगी जीने वाले ये लोग जानवरो की तरह जीने को मजबूर कर दिए गए।
क्या आप जानते है, कि इन सबका दोष क्या था?? इनका दोष ये था कि ये ज्यूस थे। इनका दोष ये था कि उस समय का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति , "हिटलर" इनकी ज़ात से नफरत करता था।
नफरत! बहुत छोटा शब्द है ये....पर ये एनी जैसी कई खूबसूरत बच्चों को कुचल देता है... ये परिवारो को रौंद देता है.... ये मानवता को ज़लील कर देता है। ये इंसानियत को कलंकित कर देता है। ये आदमी को आदमी नहीं रहने देता... जानवर बना देता है... एक क्रूर और निर्दयी जानवर... जिसका न धर्म होता है... न जात और न ही राष्ट्रीयता। नफरत में वो भारतीय होकर भी भारत को बर्बाद करना चाहता है और नफरत में वो वंदे मातरम् कहकर भी अपनी ही माँ के लाडलो को मिटाना चाहता है।
हिटलर इसी नफरत की मिसाल था... वो इतहास का वो काला पन्ना था जिसने एनी जैसे मासूमो के खून की स्याही से अपनी कहानी लिखी। आशा है... उम्मीद है... गुज़ारिश है... हम न हिटलर की नफरत को दोहराये और न एनी की दास्ताँ को!

Monday, February 15, 2016

Love is....

Love is...
When am making your favourite mooli ke parathe while listening to .."guncha koi tere naam kar diya...saki ne aaj fir se mera jaam bhar diya".
And you come all of a sudden and put 'Rum rum rum...o whisky' and I start dancing on it :)