Wednesday, March 11, 2015

फिर से मेरा देश महान होगा..फिर से मेरा देश महान होगा!!!!


एक दिन चाय की चुस्कियो के साथ पड़ोस के शर्मा जी एक किस्सा सुना रहे थे
सड़क पर पड़ी किसी बदनसीब लड़की की व्यथा बता रहे थे…
 हमने पूछा क्या आपने उसे अस्पताल पहुँचाया था?
शर्मा जी भड़के... बोले.."आप होती तो मदत करती? पुलिसवालो के मामले मे बिना वजह पड़ती?"
हमने वही चुप्पी साधी..... ..
चाय तो ख़त्म हुई पर बात रह गयी आधी.

खैर रात होते होते हमने भी सब भुला दिया।
ऐसे  वारदात  तो यहा रोज़ रोज़ होते है... 
वैसे भी सुबह उठते ही सभी को बड़े काम होते है.
कुछ दिन यूही बीते,…  और शर्मा जी ने यूही कई किस्से सुनाए चाय पीते पीते..
अचानक एक दिन दिल्ली गैंग रेप का किस्सा सुनने मे आया…
और टीवी खोलते ही हमे शर्मा जी का चेहरा नज़र आया.

शर्मा जी ज़ोर ज़ोर से नारे लगा रहे थे …निर्भाया को कैसे इंसाफ़ दिलाए ये बता रहे थे
देखकर गर्व सा हुआ की जिसे शर्मा जी ने ना देखा ना सुना…बस एक पहचान जाना ‘निर्भया’
उसके लिए उन्होने ऐसा कठोर कदम उठाया!!
पर फिर प्रश्न के बादल घूमड़ कर आए की सड़क पर पड़ी उस लड़की ,जिसको शर्मा जी ने देखा था,
जिसकी कराह  सुनकर भी उनका दिल नही दुखा था…उसका क्या हुआ होगा??
वो भी तो कोई ‘निर्भया ’ या 'दामिनी' होगी,
हमारी ना हो, आपकी ना हो पर अपने अपनो की तो वो भी ‘अमानत’ रही होगी…
फिर शर्मा जी  क्यूँ क़ानून को दोषी ठहरा रहे है,क्यू अब हादसे के बाद  आँसू बहा रहे है?
दामिनी को भी  कई शर्मा जी’ यो ने देखा होगा
उनमे से कईयों ने अगले ही पल उस मंज़र को ज़हन से निकाल फेका होगा!!

हम दूसरो पर उंगली उठाते है...... 
पर जब सामने कोई हमारी बहनो को छेड़ता है तो उन उंगलियो को जोड़, एक मुठ्ठी क्यू नही बनाते है??
ये प्रश्न आज है, शायद कल ना होगा…
यूही हम अन्याय के खिलाफ लड़ते रहे दोस्तो तो..
फिर से मेरा देश महान होगा..फिर से मेरा देश महान होगा!!!!

माँ तू मुझे कोख में ही मार दे !!!


क्यों लडती है मेरे लिए तू ...अपनी हिम्मत शुरू में ही हार दे ,
माँ तू मुझे कोख में ही मार दे !!!

इस दुनिया में आकर भी क्या करुँगी ,
ऐसे नहीं तो वैसे ,एक न एक दिन तो मैं मरूंगी ,
फिर क्यों तू अपनी खुशिया मुझ पे वार दे ?
माँ तू मुझे कोख में ही मार दे !!!!

शादी की बात निकलेगी ,
तो माँ समान सास 'car' दहेज़ में लेगी ,
पिता समान ससुर सौ शर्ते रखेगा ,
परमेश्वर जैसा पति जलाने की धमकी देगा ,
अपना पेट काटकर क्यों ऐसे भेडियो को तू car दे ?
माँ तू मुझे कोख में ही मार दे !

घर से निकलूंगी तो बेवजह लड़के छेड़ जायेंगे ,
विरोध प्रकट करने पर इज्ज़त ही लूट ले जायेंगे ,
इस से पहले कोई मेरी इज्ज़त तार -तार दे ,
माँ तू मुझे कोख में ही मार दे !

दुनिया में न आ पाऊँगी ,तो बेटी न बन पाऊँगी ,
बड़ी न होने दोगे तो पत्नी या माँ भी न कहलौंगी ,
फिर वंश चलाने वाले तू विधाता से कहकर देखना 'एक जननी उधार दे ',
माँ तू मुझे कोख में ही मार दे !

देवी दुर्गा ,माता लक्ष्मी , माँ सरस्वती ,धरती माँ का रूप हु ,
क़र्ज़ है तुमपर मेरा ,फिर भी ज़ुल्म सहकर मैं चुप हु ,
मेरी रक्षा न कर सके ...इन देवियों का तो क़र्ज़ उतार दे ,
माँ तू मुझे कोख में ही मार दे !

Monday, February 16, 2015

Congratulations!


It doesn't matter anymore and trust me it really does not.  It's just that I happened to read this book about the first love of a girl and all I could think of was 'you'. First love is actually special and so are you to me. No matter how much better person has filled that place in your life,you still keep thinking how it would have been if at all there was no 'megha', if at all I was more beautiful than megha. If at all even you loved me since we were born as I did.
Holly crap.... I don't know why I'am writing this now when am happily married to another love of my life and a mom to his child and you are going to be a father with your love of life.
Anyways Congratulations!!! and sorry for the crap above :)

JODI ARO KARO BHALO BASHO
JODI ARO FIRE NAHI ASHO

TOBE TUMI JAHA CHAO
TAI JENO PAO

AMI JOTO DUKHKHO PAI GO

AMARO PORANO JAHA CHAY
TUMI TAI TUMI TAI GO ......

Tuesday, November 25, 2014

Maa ka Sapna

माँ  कहतीं है जब मैं छोटी सी थी तब हम माउंट कारमेल कॉनवेंट स्कूल के पास रहा करते थे. वहाँ की नन्स को देखकर और वहाँ  रही वेल ड्रेस्ड, यूनिफॉर्म और जूते मोज़े पहनी लड़कियों को देख उनका भी मन करता था की वे मुझे भी वहाँ भेजे. पर ज़्यादा फीस होने की वजह से और बाबा की साधारण सी नौकरी होने के कारण उन्हे लगता था की मेरा अड्मिशन वहाँ नही हो पाएगा. जब मैं तीन साल की हुई तो बाबा को डब्ल्यू. सी. एल मे नौकरी मिल गयी. और हमे रहनेको नया क्वॉर्टर. 

पड़ोस में एक शोभा दीदी रहती  थे जो संयोगवश माउंट कार्मेल स्कूल में ही पढ़ती थी।  माँ से  उनकी  दोस्ती हुई तो  उन्होंने मुझे अपने ही स्कूल में भर्ती कराने का सुझाव दे डाला।  माँ के लिए तो ये  " नेकी और  पूछ पूछ "  हो गयी। शोभा दीदी मेरे लिए फॉर्म ले आये , कुछ दिनों में मेरा और माँ - बाबा का स्कूल वालो से साक्षात्कार हुआ, और फिर मैं  भी वेल ड्रेस्ड होकर , यूनिफार्म और जूता मोज़ा पहनकर माउंट कार्मेल कॉन्वेंट स्कूल में जाने लगी।  

माउन्ट कार्मेल  स्कूल और उसमे पढ़ रहे बच्चे, दोनों ही मुझसे बहोत अलग थे।  हिन्दी और अंग्रेजी विषयो के  अलावा मुझे और कुछ पढ़ना अच्छा नहीं लगता था।  वो भी इसलिए क्योंकि  उनमे जीवन से जुडी कहानियाँ  होती थी।  नतीजतन सिर्फ इन्ही दोनों विषयो में मेरे अच्छे नंबर  आते , बाकी विषयो में तो माशाअल्लाह से पास होने में भी जैसे मेरी जान जाती थी। पढ़ाई से मेरा कुछ बैर सा था, और पढाई के अलावा जो कुछ था उनमे घरवालो को कुछ दिलचस्प नहीं लगता।  तो कुल मिलाके मैं स्कूल में  लूज़र् ही रहि. इस  वजह से  ज़्यादा  दोस्त भी नहीं बन पाये। कान्वेंट में जा रहे बच्चो को घर से हिदायत मिली होती है कि वो मुझ जैसे  लूज़र्स से दूर रहे। हाँ ! कभी कोई मुझसे भी बड़ा लूज़र मिल जाता तो उससे मेरी दोस्ती हो जाती।  पर फिर मेरे माँ बाबा मुझे उससे दूर रहने की हिदायत देने लगते :) सो ये माँ बाप के  स्कूल तक आज्ञाकारी रहने वाले बच्चे मुझसे दूर ही  रहते। इन आज्ञाकारी बच्चो में से एक गुड़ियाँ भी थी।  पर  एक ही कॉलोनी में रहने  की वजह से उसे मुझसे थोड़ी बहोत दोस्ती रखनी ही पड़ती।  पर उसके मुझसे जुड़े रहने का ये बहाना भी तब समाप्त कर  दिया गया जब   पाँचवीं कक्षा में एक बार हिस्ट्री के टेस्ट में फेल हो जाने पे मैं अपनी एक और लूज़र दोस्त के साथ स्कूल से कही भाग गयी थी। आज भी कभी मैं उस वाकए के बारे में सोचती हूँ तो लगता है कि काश उस  दिन ये याद रहता की आज तो फ्राइडे है।  उन दिनों W .C .L  में शुक्रवार  छुट्टी होती। मैं फेल होने पर माँ बाबा की डांट से ज़्यादा  लंच टाइम पर हमारे घर आनेवाली आंटियो के तंज़ो से घबराकर  थी।
स्कूल  ख़त्म हुआ।  आठवी कक्षा में संयोगवश  कुछ ऐसे दोस्त मिले जिनकी संगती के कारण मेरे रिजल्ट्स में थोड़ा बहोत सुधार आया।  दसवी में पछत्तर पर्सेंट मिले तो घरवाले गद्गद हो गए। आज का पता नहीं पर उन दिनों एक छात्र को कौनसा  चाहिए ये उसकी रूचि से  नहीं बल्कि उसके दसवी में आये नम्बरो से निर्धारित किया जाया था।  सो डिस्टिंक्शन आने पर साइंस के अलावा कोई और विषय चुनने का सवाल ही पैदा नहीं होता  था।
हमेशा फेल होती बेटी के पछत्तर पर्सेंट आ जाने से माँ बाप के सपनो को जैसे पंख से लग जाते है। बारवी में मुझे न चाहते हुए भी बायोलॉजी और मैथ्स दोनों लेने पड़े।  क्योकि माँ बाबा के पंख लगे सपनो को लगने लगा था की अगर मैं इंजीनियरिंग में न जा पायी तो  बायोलॉजी लेने से मेडिकल में तो जा सकुंगी। बायोलॉजी मेरे भागते हुए पैरो में ज़ंज़ीर का काम करती रही।
खैर किसी तरह बारवी पास की।  रिजल्ट बहोत ख़ास नहीं था।  माँ चाहती थी मैं इंजीनियरिंग करू।  क्यों? कह नहीं सकती।  शायद वे मुझे अपने से अलग ज़िन्दगी जीते देखना  थी। बाबा भी मुझे इंजीनियर बनाना  चाहते थे क्योकि ऐसा करने से चंद्रपुर के प्रवासी बंगाली परिवारो में बाबा ऐसे पहले शक्स होते जिनके दोनों बच्चे इंजीनियर होते। दादा चंद्रपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में लेक्चरर थे इसलिए मेरे उनके कॉलेज में पढ़ने से  उनके लिए भी मुझ पर नज़र रखना आसान होता।  बची मैं , तो  सपनो की भूलभुलैया में मैं इतना  उलझ गयी की इस बात पर मैंने  ही नहीं दिया की बारवी में भी मेरे सबसे ज़्यादा नंबर हिंदी और अंग्रेजी में ही मिले है।
इंजीनियरिंग के चार साल किसी सुन्दर सपने  बिते. मैंने खूब मेहनत की।  माँ बाबा को थोड़ा बहोत फक्र भी हुआ।  साहित्य, कहानियाँ , शेरो शायरी से नाता टूट सा गया। इंजीनियरिंग की डिग्री मिली। माँ, बाबा, दादा का सपना पूरा हुआ। कुछ साल मैंने नौकरी भी की।  आज़ाद रही। फिर शादी हुई।  एक अच्छा जीवनसाथी मिला जिसने हर मोड़ पे मेरा साथ दिया।
शादी के बाद भी ज़िन्दगी बिलकुल वैसे ही  चल रही थी जैसे पहले थी।  बिंदास, खुशहाल! मैं और मेरे पति दोनों नौकरी करते थे।  सुबह निकलते और रात में लौटकर एक दूसरे को दिनभर के किस्से सुनाते।  संडे को सुबह सुबह जाते।  कोई फिल्म देखते और बहार से खाना खाकर लौटते।  कई बार मुझे लगता की इससे अच्छी ज़िन्दगी हो ही नहीं सकती।
फिर एक दिन मेरी सांस बीमार पड़ी और उनकी देखभाल करने के लिए मैंने नौकरी छोड़ दी।  दो महीने उनकी सेवा करने के बाद दुबारा काम करना शुरू किया तो पता चला की मैं गर्भवती हु। मैंने फिर नौकरी छोड़ दी।
मेरी बच्ची आज चार साल की है।  इस बीच मुझे कई नौकरियों के ऑफर्स आये पर मैं नहीं कर पायी।  पिछले पांच सालो से मैं घर का और अपनी बच्ची का ध्यान रखती हु. ससुराल जाती हु तो उन सबका काम  करती हु। कोई चीज़ लेने का मन करता है तो बहोत संकोच के साथ अपने  से मांगती हु या फिर कई बार संकोच के कारण चुप ही रह जाती हु।
कल मेरे पति ने मुझसे शहर के  सबसे अच्छे स्कूल से हमारी बेटी के  लिए एडमिशन फॉर्म लाने को कहा। मुझे भी अपनी बेटी को उस स्कूल में वेल ड्रेस्ड होकर , यूनिफार्म और जूता मोज़ा पहनकर जाते हुए देखना है। मैं भी चाहती हु की वो कुछ ऐसा पढ़े या करे जिससे मैं उसे अपने  अलग ज़िन्दगी जीते हुए देख सकु।






Tuesday, November 11, 2014

Aaj Amrita main tumhe jagaana chaahti hu!


अमृता... जिस तरह तुमने कभी वारिस शाह को जगाया था...
आज मैं तुम्हे जगाना चाहती हूँ...
तुम पंजाब के हाल पर रोई थी..
मैं तुम्हे आज देश का हाल दिखाना चाहती हूँ....

तुम हैरान थी कि हीर के दर्द पर किताबे लिखने वाला वारिस शाह,

पंजाब की लाँखो लड़कियो का दर्द सुन, कब्र से क्यूँ नही उठता?
मैं परेशान हूँ कि आज सारे देश की सैंकड़ो  लड़कियाँ रोती हैं....
अमृता क्या कब्र से तुम्हे उनका दर्द नही दिखता?

वो विभाजन का दर्द था... जिससे रूहें काँप गयी.. 

कुछ वक़्त तक हीरे सिसकी.. पर फिर बाहार भी तो आई...
पर ये कैसा दर्द है जो ख़त्म ही नही होता है...
कभी दहेज..कभी रेप तो कभी भ्रूण हत्या के रूप मे रोज़ उभर आता है। 

अमृता...क्यूँ तुम इस दर्द पे अपनी कविता का मरहम नही लगाती?

पंजाब की हज़ारो लड़कियो का हाल सुनाने वाली...
तुम भारत की इन सैंकड़ो बेटियो पर कोई नज़्म क्यूँ नही सुनाती?

जब पाँच नदियो के पानी मे ज़हर मिला,

 तो खेती ज़हर से भर गयी। आज लोगो के खून मे ज़हर मिला है...
देख!!....आज तो इंसानियत ही मर गयी। 

तब रांझे सिर्फ़ गाना भूले थे..

अब रांझे जीना भूल गये...
तब हीरे क़ब्रो पर रोती थी,
अब रोते रोते उनके आँसू ही सूख गये। 

तुम उनका किस्सा लिखने को एक और वारिस शाह ढूंडती थी...

मैं इनकी व्यथा बताने को एक और अमृता ढूंडती हूँ...

अमृता...जिस तरह तुमने वारिस शाह को जगाया था..

मैं तुम्हे जगाना चाहती हूँ। 

 'अज अंक्खा वारिस शाह नु '… अमृता प्रीतम की इस कविता ने एक ज़माने में विभाजन के दर्द को ताज़ा कर दिया था। अमृता की इस कविता को जब मैंने पढ़ा.… और बार बार पढ़ा तो लगा की जिस तरह अमृता ने वारिस शाह को कब्र से जगाया था , आज मैं भी अमृता को जगाऊ और विभाजन से भी बढ़कर जिस दर्द से आज देश त्रस्त है वो दर्द उन्हें सुनाऊ । जिन लोगों ने अमृता की वो अत्भुत कविता नहीं पढ़ी है उनके लिए उस कविता को भी यहाँ लिख रही हुँ. और क्यूंकि ये कविता पंजाबी में है इसलिए उसका अंग्रेजी में अनुवाद भी पेश करती हुँ. यह कविता तथा अनुवाद दोनों ही www.folkpunjab.org से ली गयी है. जिसके लिए मैं उनकी आभारी हूँ। 



Aj aakhan waaris shah noo kito.N qabra.N vicho.N bol!
Te aj kitab-e-ishq da koi agla varka phol!
Ik roi si dhii punjab dii tuu likh-likh mare vain
Aj lakkha.N dheeyan rondian tainuu.N waaris shah noon kahan
Uth darmandan diaa dardiiaa uth tak apna punjaab!
Aj bele laashaa.N vichiiaa.N te lahu dii bharii chenaab!
Kise ne panja paania.N vich dittii zehar rala!
Te unhaa.N paaniaa.N dharat nuu.N dittaa paanii laa!
Es jarkhej zameen te loo.N loo.N phutiaa zehar
Gith gith chadiaa.N laliyaa.N , fut fut chadiaa kehar
Vihoo.N vilissi vaa fir van van vaggi ja
Ohne har ik baans di vanjhli ditti naag bnaa
Naaga.N keele lok moo.Nh bus fir dang hi dang
Plo plii panjab de neele pai gye ang
Ve glio.N tutte geet fir traklio.N tutti tand
Trinjhno.N tuttia.N sahelian charkhde ghookar band
Sne sej de bediya.An ludhan dittian rodh
Sne dalia.N peengh ajj piplaa.N diti tod
Jitthe vajdii phuuk pyaar di ve oh vanjhli gayi guaach
Ranjhe de sab veer aj bhul gaye usdi jaach
Dharti te lahu vasiya, qabran payiyan chon
Preet diyan shaahazaadiiaa.N aj vich mazaaraa.N ron
Ve aj sab ‘qaido’ ban gaye, husn ishq de chor
Aj kitho.N liaaiie labbh ke waaris shah ik hor
Aj aakhan waaris shah noon kito.N qabra.N vicho.N bol!
Te aj kitab-e-ishq da koi agla varka phol!
Lyrics contribution: Pramod Varma and Manoj Sharma

Translation

I say to Waris Shah today, speak from your grave
And add a new page to your book of love
Once one daughter of Punjab wept, and you wrote your long saga;
Today thousands weep, calling to you Waris Shah:
Arise, o friend of the afflicted; arise and see the state of Punjab,
Corpses strewn on fields, and the Chenaab flowing with much blood.
Someone filled the five rivers with poison,
And this same water now irrigates our soil.
Where was lost the flute, where the songs of love sounded?
And all Ranjha’s brothers forgotten to play the flute.
Blood has rained on the soil, graves are oozing with blood,
The princesses of love cry their hearts out in the graveyards.
Today all the Quaido’ns have become the thieves of love and beauty,
Where can we find another one like Waris Shah?
Waris Shah! I say to you, speak from your grave
And add a new page to your book of love.



Monday, September 29, 2014

Durga Pujo...Aaj 'Shoshti'...Aaj Baba retire hochchen!


30 September 2014

Its Sashti today. The day when the actual Durga puja begins for all the Bengalis. Durga Puja for me and for any other bengali is all about:

1: Loads of sweets: I remember Baba getting all the varieties available at bengali camp. I always hated goja and boondi and wondered why did Baba considered them as sweet. But the freshly made Roshogullas were my favourites.

2: Pujo Mondop: We hardly used to visit any other Pujo Mandap other than the one at Bengali camp. Simply for one reason that Baba was the secretary of the Bengali association which organised it.

3: Get together: Another reason why I loved Durga Puja was this. The puja mandap used to be the meeting point for all year lost friends. And as my childhood was a time of landlines. Most of them met like a pleasant surprise.

4: New clothes: A must for every Bengali. The whole mandap used to be filled with ladies wearing their best saree and jewellery.  I always preserved the new pujo'r dress for Ashtami morning.

5:Maha Prashad: Khichudi proshaad, mixed veg, paayesh and tomato chaatni....aahaaaa!!... Maa tried to prepare all of them at home many times but it never turned out as yummy as the Maha proshaad used to be. I heard some aunties speaking to my Maa once that even they tried to do so but no one can get the delicacy of Maha Proshad into their dishes.

6: Proshad Bitron: Serving dry prasaad to the huge crowd at the mandap was mine and my best buddies' favourite adventure. Sonu, Vivek, Supriya, Gautam da and me..... Nothing made us feel so condemned as doing this seva did.

Baba used to be busy with the preparations of the puja from almost a month before. We used to sleep without seeing Baba and wake up hearing that Baba has already left for bengali camp. Baba worked day and night. Money collection, gathering sponsors, getting the murtikar and the dhaakis, arranging all the things required from the huge list for the pujo and the never ending meetings. I saw Maa waiting for him till he came back home at night in my initial years. But then I think Maa got a little old to wait for him for so long. Baba had the same enthusiasm for each puja every year.He kind of had a joyous spark in his eyes in those days. From Sashti to Dashami he used to leave much before us and only came to pick us and then drop us back. Maa always insisted him to bow before Maa Durga. But he never did that. He said that the work that he does for the pujo was good enough.

Baba religiously worked for each and every Durga Puja and Kali Puja held by this association. We hated him doing this as this meant no time for us or even for Maa. But Baba continued doing this always until 4 years back he got a brain stroke and got paralysed. He was again at Bengali camp when he got the stroke. Since then he is at home.
Baba (now) with my daughter

Today is Sashti, the day when puja begins, the day when Baba was supposed to be the busiest. But today Baba is not at all busy. Today Baba is getting retired. He used to go to the office for two hours daily. And now he won't have to do that either. Today if I go home I will see him at home....before sleeping and after waking up. I no more hate the old time when he did not had time for us. I want him to go back and work day and night for Durga pujo again. His eyes are blank now. I want the spark of his eyes back. I want his enthusiasm back. I would never ask for his time again. But I want his old time back !

Tuesday, September 23, 2014

Mahalaya

                                                      https://encrypted-tbn3.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcQa3wN6A-t4qTiuT-_WPsOrKvl7muXMDDTXsPJu7NSGgUbbHlT_
Today is Mahalaya. I still remember those fresh Mahalaya mornings. Those were a little cold and a little cozy. Baba used to wake us up early in the morning, initially to listen to ‘Mahisasura Mardini’, the Chandi Paath on All India radio and later to watch it on Doordarshan. Every year the story looked absolutely fresh and new. Mahishasur, the son of King Rambha and Princess Mahishi pleases Lord God Brahma and asks for immortality in return. Lord Brahma refuses to make him immortal. However grants him the wish to choose his killer. Mahishasur then thinks a lot and asks for a boon to be killed by a woman as he thinks that a woman can never defeat a strong demon like him.
Maa Durga, was then took birth out Lord Brahma and Lord Shiva’s anger, to defeat Mahishasur.
Maa used to tell me that she has no idea whether this story or any of the mythological stories are true or not. But she believed that these stories had been our epics because they give us life- lessons. Yes every story has the same moral, ‘The victory of good (truth) over evil’. Ramayana had Shri Ram, who won over Ravana. Mahabharata had Pandus, who won over Kauravas. Then what is it different with Mahalaya? Yes it is Devi Durga. Mahalaya might have been made up to give all the demons that a woman can take your life. She can do what none of the men could do.
At the end of the story the Gods, rid of the demon showered Maa Durga with praises and prayed her to appear everytime they were in need of her. Maa Durga granted this wish and promised that she will come again if called with devotion.
The ‘Geeta saar’ says almost the same thing that Lord Krishna will return every time he is needed.
                                     https://encrypted-tbn3.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcTsc7mW_0wAh7Nw47KAf5X6Ul51BeILcanyEI3ZOOIgR7x2rTQ-
I don’t know much about Chirtianity or Islam but heard that even ‘Jesus’ and ‘Mohammad’ said the same things in Bible and Quraan respectively.

I often think was Nibhaya not calling devotedly Maa Durga while the brutal act was being commenced on her. Does Lord Krishna think that saving Draupadi from the disrespect against her was all he needed to do to eradicate Adharma from Bharata? When will Jesus let us celebrate Easter truly? And when will Mohammad come again to save us?