Sunday, April 11, 2021
घुटन
वह स्थिति, जब मन गले तक भरा हो पर आंखें रुदन से इनकार कर दें, क्योंकि मस्तिष्क ये मान चला है कि आप कठोर हैं।
Thursday, April 1, 2021
My Home
I wanted to go home
And realised...
There was no home..
No one made a home,
I could call mine.
And I would never be able to make one for me.
All I had was a rented house,
From where I could be kicked out any day..any time.
I wish I could make a house for my daughter.
Wednesday, March 31, 2021
छोटा आदमी
मैं छोटा आदमी हूं।
छोटी ख्वाहिशें रखता हूं।
छोटी सांसे लेता हूं।
जीवनभर छोटा ही रहूंगा।
और एक दिन छोटा ही मर जाऊंगा।
Monday, March 22, 2021
Saturday, March 20, 2021
मरने के बाद
पियूष मिश्रा का इंटरव्यू लेते हुए मैंने उनसे पूछा था, "आपके लिए सबसे बड़ा प्रश्न क्या है?"
उन्होंने उत्तर दिया था, "यही कि आदमी मरने के बाद कहां जाता है?"
मैंने उनसे पूछा था कि पता चल भी जायेगा तो क्या?
तब मुझे समझ में नहीं आता था कि यह इतना important question क्यों है।
शायद यह प्रश्न इतना जरूरी तब तक नहीं लगता, जब तक आप यहां से चले जाना नहीं चाहते। जब आप यहां से ऊब जाते हैं और दूसरी दुनिया में चले जाना चाहते हैं, तब आपको यह प्रश्न सताने लगता है। मरने से पहले मरने का डर नहीं लगता क्योंकि आप जीने से ज्यादा डर चुके होते हैं। पर अब इस बात का डर होता है कि अगर नहीं मर पाए तो बिखरे हुए टुकड़ों के साथ जीना कैसे जाती रखेंगे। और डर होता है कि मरकर भी दूसरी तरफ यही दुनिया मिली तो? यही रिश्ते, यही भूख, यही दौड़, यही ढकोसला मिला तो?
पिंजरा
हम अपने बेटों को 'पिंजरा' बना देते हैं। एक खाली पिंजरा, जो अपने आप कुछ नहीं कर सकता। जो अपने लिए कुछ.. कुछ भी नहीं कर सकता, वह अपने आप हंस बोल कैसे सकता है?
और फिर हमें उसका कुछ न होना अखरता है। पर क्योंकि अपने आप कुछ भी करना सिखाने के लिए अब बहुत देर हो चुकी है, हम इस विरान, नाकारे पिंजरे के लिए एक चिड़िया ढूंढने लगते हैं। चिड़िया मिलती है, किसी पेड़ की शाख पर बैठी चहकती हुई, अपना खाना खुद लाती हुई, हवाओं में स्वच्छंद उड़ती हुई, हंसती हुई, मुस्कुराती हुई, एक आज़द जीवन जीती हुई।
पर हम उसे ताने मारने लगते है। कैसी कुलटा है, अपना सारा काम खुद करती है, भला पिंजरे के बगैर भी कोई चिड़िया रहती है? नाक ही कटा देगी ये तो अपनी बिरादरी की!
चिड़िया को लगता है शायद ताने मारनेवाला बिलकुल ठीक कह रहा है। आखिर कोई कब तक अकेला फिरेगा? आखिर कब तक कोई सारे काम अकेला करता रहेगा। आखिर एक से भले दो। पिंजरा और मैं साथ साथ उड़ेंगे। साथ खाना लायेंगे। साथ आजाद रहेंगे!
अपने साथी को अपने जैसा ही समझकर, आंखों में घरों सपने लिए वह पिंजरे में जा बैठती है। पिंजरे का दरवाजा बंद। पिंजरा कुछ नहीं बोलता। चिड़िया चहकती है, पिंजरा चहकना नहीं जानता, सो पिंजरे का चहकना उसे बचकाना लगता है।
चिड़िया उड़ना चाहती है। पिंजरा उड़ना नहीं जानता। अपनी मजबूरी का वास्ता देकर वह चिड़िया को फिर कभी उड़ने नहीं देता।
पिंजरे का मालिक जो देता है, चिड़िया वही खाती है। कभी सूखी ब्रेड, तो कभी बची हुई रोटी। चिड़िया मिन्नत करती है कि वह झट से जाकर आम के बगीचे से एक रसीला आम तोड़ लायेगी। पिंजरे ने कभी आम नहीं चखा, उसे ये जिद फिजूल लगती है।
दिन, महीना, साल..... चिड़िया बिलकुल पिंजरे की सी हो जाती है। न हंसती है, न बोलती है। बस पिंजरे की साथी होने का तमगा लिए बैठी रहती है।
पिंजरे का मालिक अपने एक दोस्त से एक दिन कहता है, "हम तो इसे यह सोचकर लाए थे कि हमारे पिंजरे का मन लगाए रखेगी। पर ये तो बिलकुल नाकारी निकली।"
चिड़िया को अपना जीवन व्यर्थ लगने लगता है। वह मर जाती है। पिंजरा अकेला हो जाता है। पिंजरे का मालिक एक और चहकती चिड़िया के पास जाता है।
12 साल
और फिर एक दिन वे कह देते हैं... क्या किया है तुमने मेरे लिए? और तुम नींद से जागते हो। नींद नहीं, शायद नशे से।
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